Monday, June 22, 2020

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प्याज महंगा है, फिर भी इन स्वास्थ्य लाभ के लिए रोज खाएं

आमतौर पर प्याज कटता है तो आंसू आते हैं, फिलहाल कुछ महीनों से यह बिना कटे ही आंसू निकाल रहा है। प्याज की महंगाई का आलम यह है कि देश के कुछ इलाकों में यह 200 रुपये किलो तक बिक रहा है। प्याज को लेकर राजनीति भी देश में खूब होती रही है। 1980 के आम चुनाव को 'अनियन इलेक्शन' भी कहा गया था, क्योंकि प्याज की बढ़ती कीमतों के खिलाफ प्रदर्शन करने के बाद इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई थी। इसी तरह प्याज की बढ़ी हुई कीमतों के चलते ही साल 1998 में दिल्ली से भाजपा सरकार का सफाया हुआ और शीला दीक्षित पहली बार मुख्यमंत्री बनी थीं। प्याज एक बार फिर रोज अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खियों में है। ऐसे में चलिए जानते हैं स्वास्थ्य की दृष्टि से प्याज हमारे लिए कितना जरूरी है और इसमें कौन-कौन से पोषक तत्व होते हैं।


खामोशी से काम करता है प्याज

वैसे तो प्याज कभी भी हमारी किसी भी सब्जी का मुख्य भाग नहीं होता, लेकिन लगभग हर सब्जी के लिए हमें प्याज की जरूरत होती है। सब्जी में प्याज के पोषक तत्वों के बारे में भी बात नहीं होती है। बात होती है तो बस उस सब्जी के बारे में जिसमें प्याज का इस्तेमाल किया गया है, यानि इतने महत्वपूर्ण प्याज को हम नजरअंदाज कर देते हैं। ये है स्वास्थ्य से जुड़ी प्याज की अनसुनी कहानी...


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सलाद में प्याज

सलाद के रूप में प्याज काफी पसंद किया जाता है, खासतौर पर गर्मियों के दिनों में। 100 ग्राम प्याज में लगभग 40 कैलोरी होती हैं, इसमें 89 फीसदी पानी, 9 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट और 1.7 फीसदी फाइबर होता है। प्याज से हमें प्रोटीन और फैट की भी कुछ मात्रा मिल जाती है। ग्लूकोज, फ्रक्टोज और स्क्रोज भी प्याज से मिलते हैं। प्याज प्यार से बनाए आपके पोषक भोजन में स्वाद का तड़का लगाता है। आंसुओं के साथ प्याज को काटने से लेकर उसे अपने भोजन में मिलाने तक आप, जितनी अलग-अलग तरह से इसे इस्तेमाल करते हैं उतने ही अलग-अलग स्वाद प्याज से मिलते हैं। इसमें ज्यादा कैलोरी भी नहीं होतीं, इसलिए आप बिना चिंता के प्याज का सेवन कर सकते हैं।


आंत के कैंसर का खतरा कम करे प्याज

यह सर्वमान्य तथ्य है कि प्याज में बेहद महत्वपूर्ण प्रीबायोटिक फाइबर होता है। यह पेट में जाने के बाद हेल्दी बैक्टीरिया (प्रोबायोटिक्स) को बढ़ने में मदद करता है। हेल्दी बैक्टीरिया हमारे पेट की सेहत को सुधारता है। साल 2018 में हुई एक स्टडी के अनुसार प्याज में पाया जाने वाला प्रीबायोटिक फाइबर फलों, सब्जियों और साबुत अनाज से मिलने वाले फाइबर से भी ज्यादा लाभदायक हो सकता है। प्याज में पाया जाने वाला प्रीबायोटिक फाइबर बड़ी आंत के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है और इससे आंत के कैंसर (कोलन कैंसर) का खतरा कम होता है।


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प्याज को उसके एंटीऑक्सीडेंट गुणों और सल्फर कंटेंट के लिए जाना जाता है। प्याज में पाए जाने वाले क्यूरसेटिन नामक एंटीऑक्सीडेंट को उच्च रक्तचाप और हार्ट हेल्थ के लिए उपयोगी माना जाता है। प्याज में मौजूद कई तरह के सल्फाइड कई किस्म के कैंसर के खतरों को कम करने के लिए जाने जाते हैं। प्याज में एंटीबैक्टीरियल और एंटीवायरल गुण भी होते हैं।


विटामिन और मिनरल्स से भरपूर है प्याज

प्याज विटामिन सी, बी6, बी9 (फोलेट) और पोटैशियम का प्रमुख स्रोत है। यह सभी तत्व रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) बढ़ाने, हृदय स्वास्थ्य और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने जैसे स्वास्थ्य लाभों के लिए जाने जाते हैं। हालांकि, अभी तक इस बारे में तस्वीर स्पष्ट नहीं है कि इन तत्वों को शरीर कैसे ग्रहण करता है, इसलिए इनके फायदों को लेकर किसी स्पष्ट निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता। हालांकि, माना जाता है कि पकाने से कुछ तत्व नष्ट हो जाते हैं या उनके गुण कम हो जाते हैं, इसलिए प्याज को कच्चा खाना अच्छा माना जाता है। कटने के 10 मिनट बाद कच्चा प्याज खाने से कई तरह के स्वास्थ्य लाभ मिल सकते हैं।


डायबिटीज में फायदेमंद प्याज

माना जाता है कि डायबिटीज के मरीजों को प्याज के सेवन से फायदा होता है, हालांकि अभी इस पर रिसर्च की जरूरत है। टाइप 2 डायबिटीज पर हुई एक स्टडी में पता चला कि प्रतिदिन 100 ग्राम प्याज के सेवन से ब्लड शुगर के स्तर को नीचे लाने में मदद मिलती है। एक ऑब्जरवेशनल स्टडी के अनुसार प्याज का सेवन महिलाओं में हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है।


(वीडियो देखें - प्याज का रस बालों के लिए)


ऐसे काटेंगे तो प्याज कटने पर नहीं निकलेंगे आंसू

महंगा होने के बावजूद अगर आपने प्याज खरीदने की हिम्मत दिखा ही दी है तो बता दें कि इसे पानी में काटने से आंसू कम निकलेंगे। दरअसल प्याज को काटने पर उसमें मौजूद लैक्रमैट्री फैक्टर हवा में उड़ता है और आंसू निकालता है। पानी इस गैस के बड़े हिस्से को खुद में घोल देता है, जिससे आंसू कम निकलते हैं। 


ऐस लोग सस्ता होने पर भी न खाएं प्याज

फिलहाल लोगों ने महंगाई की वजह से प्याज से दूरी बना रखी है। कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें सस्ता होने पर भी प्याज से दूर ही रहना चाहिए। हालांकि, प्याज से जुड़ी एलर्जी आम बीमारी नहीं है, लेकिन जिन्हें यह परेशानी है उन्हें प्याज नहीं खाना चाहिए। इसमें एफओडीएमएपी (FODMAP) होता है। यह एक शॉर्ट चेन कार्बोहाइड्रेट है जो उन लोगों के पेट के लिए घातक हो सकता है, जो इसे पचा नहीं पाते। जिन लोगों में इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम (आईबीएस) होता है, उनमें एलर्जी और एफओडीएमएपी की आशंका ज्यादा है। इसके लक्षण इस प्रकार हैं


पेट में गैस

सूजन (पेट फूलना)

डायरिया

कब्ज

एसिड रिफलक्स

diabetes aam

डायबिटीज में आम खाना चाहिए या नहीं

गर्मी के मौसम में आम का स्वाद चखने का मजा हर कोई लेना चाहता है। शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो फलों के राजा के साथ मित्रता नहीं करना चा​हेगा। पका हुआ आम न सिर्फ स्वादिष्ट होता है बल्कि यह पोषण से भी भरा होता है। इन्हें छीलकर, आम पन्‍ना, शेक बनाकर, आमरस, आम श्रीखंड, आम कस्टर्ड, आमपद या आम कुल्फी के रूप भी सेवन किया जा सकता है। बहरहाल, डायबिटीज से ग्रस्त व्यक्ति इस बात को लेकर जरूर चिंतित रहते हैं कि उन्हें इसका सेवन करना चाहिए अथवा नहीं।


यह फल इतना लोकप्रिय है कि दुनिया के अधिकांश हिस्सों में इसका व्यापार किया जाता है। भारत में आम की लगभग 1,000 किस्में हैं और इनमें से कई अनोखे, सुंदर और स्वादिष्ट होते हैं। भारत आमों के प्रमुख वैश्विक निर्यातकों में से एक है। यहां लगभग प्रत्येक व्यक्ति आम को खाना पसंद करता है।


आम के बारे में एक महत्वपूर्ण बात जानना जरूरी है कि इसमें शुगर की मात्रा अधिक होती है: प्रत्येक 100 ग्राम आम में 15 ग्राम कार्बोहाइड्रेट होता है, जिनमें से 14 ग्राम प्राकृतिक चीनी होती है। भारत में डायबिटीज मरीजों की संख्या 72.96 मिलियन यानी करीब 7 करोड़ 30 लाख है। यदि कोई व्यक्ति मधुमेह (डायबिटीज) से ग्रस्त है, तो वह ऐसा मान लेता है कि उसे इस फल का सेवन नहीं करना चाहिए।


आम में प्राकृतिक रूप से शुगर और कार्बोहाइड्रेट होता है, इसलिए लोगों की यह धारणा है कि इस फल का एक टुकड़ा खाने से भी ब्लड शुगर बढ़ सकता है और डायबिटीज से ग्रस्त किसी व्यक्ति की स्थिति बदतर हो सकती है। फिलहाल, इस धारणा के बावजूद हाल ही में हुए एक शोध से पता चला है कि आम वास्तव में हानिकारक नहीं हैं और डायबिटीज वाले लोगों द्वारा इसका सेवन किया जा सकता है। निम्नलिखित जानकारियों से यह समझने में मदद मिलेगी कि डायबिटीज होने पर आम का सेवन करना सुरक्षित है या नहीं।


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आम में मौजूद पोषण तत्व

अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसडीए) के अनुसार, 100 ग्राम आम में 13.66 ग्राम चीनी होती है, जिनमें से 6.97 ग्राम सुक्रोज, 2.01 ग्राम ग्लूकोज या डेक्सट्रोज और 4.68 ग्राम फ्रुक्टोज या फल चीनी (फ्रूट शुगर) होता है।


कोई भी व्यक्ति आम के मीठे स्वाद का आनंद ले सकता है। वास्तव में आम में सिर्फ शुगर ही नहीं होता है, बल्कि यह शरीर के दैनिक आहार फाइबर की जरूरतों का 40% तक प्रदान कर सकता है। आम में विटामिन ए, विटामिन सी, विटामिन ई, कॉपर, फोलेट (विटामिन बी 9) और पोटेशियम भी होता है। यह फल एस्कॉर्बिक एसिड, कैरोटीनॉइड और फेनोलिक यौगिकों जैसे आहार एंटीऑक्सिडेंट का एक बड़ा स्रोत है।


चूंकि आम में 90 फीसद शुगर होता है, इसलिए यह डायबिटीज वाले किसी भी व्यक्ति में उसके ब्लड शुगर के स्तर को प्रभावित कर सकता है। लेकिन इस फल में फाइबर और एंटीऑक्सिडेंट्स भी होता है, जो ब्लड शुगर के स्तर पर पड़ने वाले प्रभाव की दर को कम करने में मदद करता है। इसके अलावा अन्य खाद्य पदार्थों जैसे हंग कर्ड के साथ आम का सेवन करने से यह ब्लड शुगर के बढ़ने की दर को कम करने में मदद करता है।


इसलिए, आम खाने के बाद ब्लड शुगर में वृद्धि हो सकती है, लेकिन इसके दुष्प्रभाव को आसानी से रोका जा सकता है। एक आम में ऐसे पोषक तत्व होते हैं जो प्रतिरक्षा प्रणाली, पाचन तंत्र, आंखों का स्वास्थ, त्वचा को साफ करना और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है।


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आम के बारे में एक और सकारात्मक बात यह है कि यह पोटेशियम का एक अच्छा स्रोत है: 100 ग्राम आम में लगभग 168 मिलीग्राम पोटेशियम होता है और पोटेशियम शरीर में इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण खनिज माना जाता है। जो लोग डायबिटीज से ग्रस्त हैं उनमें अक्सर हाई बीपी की समस्या होती है। शोध से पता चला है कि हाई बीपी वाले लोगों में पोटेशियम ब्लड प्रेशर को कम कर सकता है। वास्तव में आम की बहुत छोटी खुराक भी डायबिटीज से ग्रस्त लोगों के लिए लाभदायक होती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, हाई बीपी और डायबिटीज जैसी लंबे समय तक प्रभावित करने वाली बीमारी से ग्रसित लोगों को अपनी डाइट के बारे में डॉक्टर से सलाह लेना चाहिए।


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आम में ग्लाइसेमिक इंडेक्स

डायबिटीज होने पर व्यक्ति को 'लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स फूड्स' का सेवन करना चाहिए क्योंकि यह ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने में मदद करते हैं। ग्लाइसेमिक इंडेक्स (जीआई) खाद्य पदार्थों की रैंकिंग का एक तरीका है। इससे यह पता चलता है कि ब्लड शुगर पर कार्बोहाइड्रेट के जरिये कितना प्रभाव पड़ता है। लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स फूड्स में निम्नलिखित शामिल हैं :


साबुत अनाज ओर मल्टी ग्रेन वाली ब्रेड

सेब, स्ट्रॉबेरी, आड़ू, आलूबुखारा, नाशपाती और किवी जैसे फल

गाजर, ब्रोकली, फूलगोभी, टमाटर और तोरई जैसी सब्जियां

दाल, छोले, सेका हुआ बीन, बटर बीन्स, राजमा जैसी फलियां

पास्ता, सोबा नूडल्स, सेंवई नूडल्स ओर चावल नूडल्स

बासमती, डूंगरा, लंबे अनाज (लांग ग्रेन) और भूरे चावल (ब्राउन राइस) जैसे चावल आदि।

जीआई को मापने का पैमाना 0-100 नंबर होता है, जिसमें 0 का अर्थ हुआ कि ऐसे भोजन का ब्लड शुगर पर कोई प्रभाव नहीं है और 100 नंबर का मतलब प्योर शुगर का सेवन करने के बाद ब्लड प्रेशर बढ़ने का खतरा रहता है। इस पैमाने पर 55 से नीचे रैंक वाले खाद्य पदार्थों को कम जीआई माना जाता है और इसलिए इसे डायबिटीज वाले लोगों के लिए एक सुरक्षित विकल्प माना जाता है।


आम भी सुरक्षित जीआई रेंज के अंतर्गत आता है, इसलिए इसका सेवन डायबिटीज से ग्रस्त लोग कर सकते हैं। हालांकि, यह याद रखना जरूरी है कि विभिन्न खाद्य पदार्थों के लिए शारीरिक प्रतिक्रिया, चयापचय और डायबिटीज के चरण के आधार पर अलग-अलग हो सकती है।


आम के छिलके और पत्तियों के फायदे

यदि आम का सेवन कम मात्रा में किया जाए तो डायबिटिक रोगियों को इससे कोई नुकसान नहीं होता है। आम (उदाहरण के तौर पर आम के छिलके से बना हुआ पाउडर) के माध्यम से कुछ ऐसे भी प्रोडक्ट तैयार किए जाते हैं जो डायबिटीज के उपचार के लिए प्रयोग किए जा सकते हैं।


2015 में जर्नल ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चर में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, आम के छिलके के पाउडर के सेवन से शरीर में एंटीऑक्सीडेंट एंजाइम की मात्रा बढ़ जाती है, जबकि यह वसा को कम करने में मदद करता है। यह ब्लड शुगर के स्तर को सुधारने में भी सहायक है।


2017 में जर्नल ऑफ एडवांस्ड फार्मास्युटिकल टेक्नोलॉजी एंड रिसर्च में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन से पता चला है कि आम के पत्तों का अर्क विशेष रूप से पॉलीफेनोलिक यौगिक जिसे मैंगिफरिन के रूप में जाना जाता है - ब्लड शुगर के स्तर को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। इसलिए, आम के छिलके का पाउडर या आम के पत्तों का अर्क कभी-कभी डायबिटीज से ग्रस्त रोगियों के लिए वैकल्पिक दवाओं के रूप में उपयोग किया जा सकता है।


कृपया याद रखें कि ये वैकल्पिक उपचार डायबिटीज के लिए ली जा रहीं दवाओं जेसे मेटफोर्मिन टैबलेट या इंसुलिन इंजेक्शन की ज​गह नहीं ले सकती हैं। फिलहाल, डायबिटीज की नियमित दवाओं के अलावा यदि किसी अन्य दवाई को लेने या वैकल्पिक उपचार की सोच रहे हैं तो ऐसे में अपने डॉक्टर से सलाह लें।


आम को डायबिटीज फ्रेंडली बनाने के टिप्स

वैसे तो आम का सेवन करना हानिकारक नहीं हो सकता है, लेकिन यदि किसी व्यक्ति को डायबिटीज है या उसमें इस बीमारी के विकसित होने का खतरा है, तो उसे इसके अत्यधिक सेवन से बचना चाहिए। यहां कुछ महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है, जो यह सुनिश्चित करने में मदद कर सकती हैं कि ब्लड शुगर का स्तर बढ़ने न पाए।


जब कोई व्यक्ति डायबिटीज से ग्रस्त होता है, तो फलों को केवल अन्य कार्बोहाइड्रेट के बदले में ही खाना चाहिए। इसलिए, यदि कोई व्यक्ति आम खाने का शौकीन है या आम खा रहा है, तो ऐसे में उसे अन्य कार्ब्स खाने से बचना चाहिए।


एक दिन में आधा कप कटा हुआ आम (या 12 ग्राम) के साथ शुरुआत की जा सकती है और यदि कोई व्यक्ति आम का सेवन कर रहा है, तो उसे कार्बोहाइड्रेट के किसी भी अन्य स्रोत से दूर रहना चाहिए। यदि इससे ज्यादा मात्रा में आम का सेवन किया जा रहा है तो ऐसे में ब्ल्ड शुगर की मात्रा काफी बढ़ जाती है, इसलिए डायबिटीज मरीज संतुलित मात्रा में ही आम का सेवन करें।


फाइबर और प्रोटीन ब्लड शुगर के बढ़ने का जोखिम कम करते हैं। इसलिए केवल आम का एक टुकड़ा खाने की बजाय, उसके ठीक पहले या उसके साथ एक अंडा या नट्स खाएं।


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fiber

फाइबर की कमी

परिचय


फाइबर एक प्रकार का कार्बोहाइड्रेट्स होता है, जिसको शरीर पचा नहीं सकता। हालांकि ज्यादातर प्रकार के कार्बोहाइड्रेट्स छोटे कणों में टूट कर शुगर के कणों में परिवर्तित हो जाते हैं। फाइबर शुगर में नहीं बदलता यह बिना पचे ही शरीर से बाहर निकल जाता है। 


भोजन के अन्य तत्व जैसे वसा, प्रोटीन या कार्बोहाइड्रेट्स को हमारा शरीर तोड़कर अवशोषित कर लेता है वहीँ फाइबर को हमारा शरीर ना तोड़ पाता है और ना  अवशोषित कर पाता है। यह पेट, छोटी व बड़ी आंत से गुजरते हुऐ भी वैसा ही रहता है।


वास्तव में हमारे शरीर में फाइबर की कमी नहीं हो सकती है, क्योंकि हमारा शरीर इसको अवशोषित ही नहीं कर पाता और शरीर में फाइबर की मात्रा मापने का भी अभी तक कोई तरीका नहीं है। लेकिन संभव है कि यही आपके भोजन में फाइबर की कमी हो तो कब्ज होना शरीर में फाइबर की कमी का सबसे मुख्य संकेत होता है। फाइबर की कमी का परीक्षण करने के लिए कोई टेस्ट मौजूद नहीं है, डॉक्टर आपके लक्षणों व स्वास्थ्य संबंधी पिछली जानकारी के आधार पर ही इस स्थिति की जांच करते हैं।


फाइबर की कमी के इलाज के लिए फाइबर से उच्च भोजन खाना और फाइबर फोर्टिफाइड (फाइबर को कृत्रिम रूप  से मिलाना) खाद्य पदार्थ खाना चाहिए।


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फाइबर की खुराक - Daily requirement of fiber in Hindi

फाइबर रोजाना कितना मात्रा में लेना चाहिए?


50 साल के कम उम्र वाले पुरुषों के लिए प्रतिदिन फाइबर की मात्रा 38 ग्राम और महिलाओं के लिए 25 ग्राम होती है।

50 साल से अधिक उम्र वाले पुरुषों के लिए फाइबर की मात्रा प्रतिदिन 30 ग्राम और महिलाओं के लिए 21 ग्राम होती है।

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आहार में फाइबर की कमी के प्रकार - Types of Low fiber diet in Hindi

फाइबर की कमी कितने प्रकार की होती है?


फाइबर की कमी के मुख्य रूप से निम्न प्रकार हैं:


पानी में घुलनशील फाइबर पानी में घुल कर “जेल” के जैसा एक पदार्थ बनाता है। यह फाइबर ओट्स, जौ, मटर, सेम, सेब और खट्टे फलों आदि में पाया जाता है। इस प्रकार का फाइबर कोलेस्ट्रॉल और ग्लूकोज से स्तर को कम करने में मदद करता है। 

पानी में अघुलनशील फाइबर पानी में नहीं घुल पाता। यह फाइबर भोजन को पाचन प्रणाली से निकलने में मदद करने के साथ साथ अधिक मात्रा में  मल निकलने में भी मदद करता है। अघुलनशील फाइबर मुख्य रूप से साबुत अनाज, आटा, गेहूं का चोकर, नट्स (बादाम सुपारी आदि), बीन्स और फूलगोभी व आलू जैसी सब्जियां आदि में पाया जाता है।

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आहार में फाइबर की कमी के चरण - Stages of Low fiber diet in Hindi

आहार में फाइबर की कमी के लक्षण - Low fiber diet Symptoms in Hindi

फाइबर की कमी के लक्षण क्या हैं?


कुछ संकेत व लक्षण हैं, जो ये बताते हैं कि आप भोजन में पर्याप्त मात्रा में फाइबर नहीं ले रहे हैं, इनमें निम्न शामिल हैं:


कब्ज:

यदि आपका मल हफ्ते में तीन बार या उससे भी कम आता है और मल सूखा व कठोर होता है, तो आपको कब्ज हो गई है। पर्याप्त मात्रा मे फाइबर ना लेने के परिणामस्वरूप आपको कब्ज हो सकती है लेकिन एक्सरसाइज ना करना और कुछ प्रकार की दवाएं या सप्लीमेंट्स आदि लेने के कारण भी आपको कब्ज हो सकती है।

(और पढ़ें - कब्ज दूर करने के घरेलू उपाय)

 

वजन बढ़ना:

यदि आप लगातार फाइबर की कमी वाले खाद्य पदार्थ खा रहे हैं, तो आपका वजन बढ़ने का खतरा भी हो सकता है। फाइबर पेट भरने (संतुष्ट होना) में मदद करता है, इसलिए यदि भोजन में फाइबर ना हो तो लोग अधिक खा लेते हैं और उनका वजन बढ़ने लगता है। फाइबर से उच्च खाद्य पदार्थों को अधिक देर तक चबाना पड़ता है और रिफाइंड शुगर या कार्बोहाइड्रेट्स के मुकाबले ये धीरे-धीरे पचते हैं इनकी मदद से पेट काफी देर तक भरा रहता है।

(और पढ़ें - वजन कम करने के लिए भोजन)

 

ब्लड शुगर में उतार-चढ़ाव:

यदि आपको डायबिटीज है और आपको ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने में परेशानी हो रही है, तो हो सकता है कि आप आहार में पर्याप्त मात्रा में फाइबर प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं।

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जी मिचलाना या थकान (आहार से संबंधित):

यदि आप ज्यादातर कैलोरी वाले ऐसे खाद्य पदार्थों से ले रहे हैं, जिनमें प्रोटीन अधिक मात्रा में हो या कार्बोहाइड्रेट्स कम मात्रा में हो जैसे मीट, अंडे या पनीर आदि। ऐसी स्थिति में आपका सिर्फ कोलेस्ट्रॉल ही नहीं बढ़ता बल्कि आपको थकान, कमजोरी और जी मिचलाना आदि जैसी समस्या होने लग जाती है।

(और पढ़ें - थकान दूर करने के उपाय)


डॉक्टर को कब दिखाएं?


यदि आपको एक हफ्ते में तीन बार से भी कम मल आता है, तो यह संकेत हो सकता कि आप भोजन में पर्याप्त मात्रा में फाइबर नहीं ले रहे हैं। इसलिए आपको अच्छे से जांच करवाने के लिए डॉक्टर को दिखा लेना चाहिए। 


(और पढ़ें - मांसपेशियों की कमजोरी के लक्षण)


आहार में फाइबर की कमी के कारण - Low fiber diet Causes in Hindi

फाइबर की कमी क्यों होती है?


वास्तव शरीर के अंदर फाइबर की कमी नहीं हो सकती क्योंकि आपका शरीर फाइबर को अवशोषित नहीं करता है। शरीर के अंदर फाइबर की मात्रा को मापने का कोई तरीका भी उपलब्ध नहीं है। लेकिन भोजन जो आप खा रहे हैं उसमें फाइबर की कमी हो सकती है।


यदि आप नीचे बताए गए खाद्य पदार्थों को पर्याप्त मात्रा में अपने आहार में शामिल नहीं कर रहे हैं, तो आपको फाइबर की कमी हो सकती है:


साबुत अनाज से बने उत्पाद

फल

सब्जियां

बीन्स, मटर व अन्य फलियां

नट्स (काजू बादाम आदि) व बीज

(और पढ़ें - हरी सब्जियों के गुण)

 


आहार में फाइबर की कमी से बचाव - Prevention of Low fiber diet in Hindi

फाइबर की कमी की रोकथाम कैसे करें?


कुछ उपाय हैं जिनकी मदद से फाइबर की कमी होने से बचाव किया जा सकता है:


फलों का जूस पीने की बजाए साबुत फल खाएं

सफेद चावल, ब्रैड और पास्ता की जगह पर ब्राउन राइस और साबुत अनाज से बने उत्पाद खाएं

सुबह के भोजन में साबुत अनाज वाले सेरियल (भुने हुऐ अनाज) के उपयोग करें

मीट व चिकन आदि की जगह पर बिना नमक वाले नट्स व बीज खाएं

स्नैक्स में चिप्स, बिस्किट या चॉकलेट आदि  खाने की बजाए कच्ची खाई जाने वाली सब्जियां खाएं

हफ्ते में दो या तीन बार मीट की जगह पर बीन्स या अन्य फलियों का उपयोग करें या उनसे बने सूप पिएं।

कुछ ऐसे भोजन जिनमें भरपूर मात्रा में फाइबर होता है:


मटर

नाशपाती

ब्राउन राइस

ओटमील

अलसी के बीज

मक्का

ओकरा (एक प्रकार की भिंडी)

फूलगोभी

आलू

शकरकंद

संतरा

केला

काबुली चना

ब्रोकोली

बादाम

सेब

अंजीर

प्याज

चिया के बीज 

(और पढ़ें - पुदीने की चाय के फायदे)


आहार में फाइबर की कमी का परीक्षण - Diagnosis of Low fiber diet in Hindi

फाइबर की कमी का परीक्षण कैसे किया जाता है?


आपके लक्षणों की गंभीरता व समय के बारे में जानकर और आपके खाने की आदतों संबंधी जानकारी लेकर डॉक्टर फाइबर की कमी का परीक्षण कर सकते हैं। ऐसा कोई टेस्ट नहीं है, जिनकी मदद से यह पता लगाया जा सके की आपको फाइबर की कमी है या नहीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि फाइबर कभी शरीर के अंदर जमा होता ही नहीं है। 


हालांकि डॉक्टर कुछ टेस्ट करवाने का सुझाव दे सकते हैं, ताकि आपको महसूस हो रहे लक्षणों के अन्य कारणों का पता लगाया जा सके।


(और पढ़ें - लैब टेस्ट क्या है)


आहार में फाइबर की कमी का इलाज - Low fiber diet Treatment in Hindi

फाइबर की कमी का इलाज कैसे करें?


बच्चों को स्वस्थ व एक्टिव रखने के लिए उनके आहार में फाइबर होना बहुत जरूरी है। 


यदि आपको कब्ज हो रही है, तो अपने आहार में रोजाना साबुत अनाज, फल और सब्जियों की मात्रा बढ़ाने से कब्ज कम हो सकती है।


फाइबर से भरपूर आहार खाने से बढ़ते वजन को भी रोका जा सकता है। फाइबर से उच्च खाद्य पदार्थों को अधिक चबाना पड़ता है और यह आपके पेट के अधिक देर तक भर कर रखता है जिसकी मदद से आप अधिक नहीं खा पाते।


अपने आहार में फाइबर की मात्रा कैसे बढ़ाएं?


सुबह के भोजन के समय फाइबर से उच्च सेरियल का उपयोग करें और एक बार के भोजन में कम से कम 5 या उससे अधिक फाइबर लें। साबुत अनाज या गेहूं के चोकर आदि से युक्त सेरियल का उपयोग करें जिसमें कृत्रिम रूप से फाइबर मिलाया गया हो। इसके अलावा आप अपने पसंदीदा सेरियल में कुछ चम्मच गेहूं मिले सकते हैं।

फल और सब्जियों में विटामिन व मिनरल के साथ-साथ फाइबर भी भरपूर मात्रा में होता है। दिन में कम से कम पांच या उससे ज्यादा बार फल व सब्जियां खाने की कोशिश करें। 

एक मुट्ठी नट्स या ड्राई फ्रूट्स खाना भी स्वास्थ्य के लिए काफी अच्छा हो सकता है और इनमें भरपूर मात्रा में फाइबर होता है। हालांकि ड्राई फ्रूट्स में कैलोरी भी अधिक मात्रा में होती है। 

केक व कुकीज के लिए क्रश्ड ब्रान सेरियल, बिना भुनी गेहूं का चोकर या बिना पके ओटमील का उपयोग करें

बीन्स, मटर व दालें आदि फाइबर का एक अच्छा स्रोत हैं। सलाद या सूप में राजमा को भी शामिल करें। 

खूब मात्रा में पानी पिएं। फाइबर पानी में घुल कर और अच्छे से काम करता है और आपके मल को नरम बना देता है। 

(और पढ़ें - खाली पेट पानी पीने के फायदे)


फाइबर के सप्लीमेंट्स और फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ:


फाइबर सप्लीमेंट्स की बजाए साबुत अनाज से बने उत्पाद खाना बेहतर होता है। फाइबर के सप्लीमेंट्स विभिन्न प्रकार के फाइबर, विटामिन, मिनरल और अन्य कई अच्छे पोषक तत्व प्रदान नहीं करते वहीँ साबुत अनाज करते हैं। 


पर्याप्त मात्रा में सेरियल, दही और आइस क्रीम खाने (खासकर जो फाइबर युक्त हों) से भी अधिक मात्रा में फाइबर प्राप्त किया जा सकता है। भोजन में अतिरिक्त रूप से शामिल किए गए फाइबर को इन्यूलिन (inulin) के नाम से जाना जाता है। कुछ लोगों को ये खाद्य पदार्थ खाने से गैस की समस्या भी हो जाती है। 


हालांकि यदि आहार में बदलाव से फाइबर की कमी पूरी ना हो पाए या फिर यदि कब्ज, दस्त या इरिटेबल बाउल सिंड्रोम जैसी कोई समस्या है, तो उन मरीजों को फाइबर के सप्लीमेंट्स लेने की आवश्यकता पड़ सकती है।


(और पढ़ें - पेट में गैस का कारण)


फाइबर की कमी से होने वाली बीमारी और रोग - Fiber Deficiency diseases in Hindi

फाइबर की कमी से होने वाले रोग?


खून में टोटल व लो डेन्सिटी कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने से धमनी की बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है, जैसे कोरोनरी अर्टरी डिजीज और स्ट्रोक आदि। जीवनशैली से जुड़ी आदतें जैसे कम फाइबर वाले खाद्य पदार्थ आदि से भी कोलेस्ट्रॉल बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है। 


फाइबर के उचित सेवन से कई समस्याएं विकसित होने का खतरा कम हो जाता है, जैसे हृदय रोग, डायबिटीज, डाइवर्टिक्युलाइटिस और कब्ज आदि। 


यदि फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थों की बजाए ऐसे आहार खा रहे हैं, जो अचानक से ब्लड शुगर को बढ़ा देते हैं। ऐसे भोजन खाने से टाइप 2 डायबिटीज होने का खतरा बढ़ जाता है। 


डाइवर्टिक्युलाइटिस में आंत में सूजन आ जाती है। यह उम्र से जुड़ा एक काफी सामान्य आंत संबंधी विकार है, जो अक्सर फाइबर की कमी होने के साथ होता है। 


फाइबर से युक्त भोजन आपके स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छे होते हैं। लेकिन बहुत अधिक मात्रा में फाइबर युक्त भोजन खाने से पेट में गैस, पेट फूलना और पेट में मरोड़ जैसी समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। आहार में फाइबर की मात्रा को लगभग एक हफ्ते तक धीरे-धीरे बढ़ाएं, ऐसा करने से आंतों में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया भोजन में हुऐ बदलाव की आदत डाल लेते हैं। 


(और पढ़ें - बैक्टीरियल संक्रमण का इलाज)


आहार में फाइबर की कमी में क्या खाना चाहिए? - What to eat during Low fiber diet in Hindi?

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यूरिक एसिड बढ़ना

रक्त में यूरिक एसिड का स्तर बढ़ना का क्या मतलब होता है?


रक्त में बहुत अधिक यूरिक एसिड बढ़ने को चिकित्सीय भाषा में हाइपरयूरिसीमिया (Hyperuricemia) कहा जाता है। यूरिक एसिड का स्तर बढ़ने से कई बीमारियां हो सकती हैं, जैसे गाउट (आर्थराइटिस का एक दर्दनाक रूप)। यह समस्या अन्य स्वास्थ्य स्थितियों जैसे हृदय रोग, शुगर और किडनी रोग से भी सम्बंधित है।


(और पढ़ें - हृदय रोग का उपचार)


आपके द्वारा खाए गए भोजन और शरीर की कोशिकाओं के टूटने की प्राकृतिक प्रक्रिया के द्वारा यूरिक एसिड बनता है।


गुर्दे खून में से अधिकतर यूरिक एसिड को साफ कर देते हैं, जो फिर मूत्र के माध्यम से शरीर से बहार निकल जाता है। इसके अलावा यूरिक एसिड का कुछ भाग मल के द्वारा भी शरीर से बाहर निकलता है। लेकिन इसके अधिक बनने की स्थिति में किडनी रक्त से इसको हटा नहीं कर पाती है। इसके चलते रक्त में यूरिक एसिड का स्तर बढ़ जाता है।


(और पढ़ें - यूरिन टेस्ट कैसे किया जाता है)


रक्त में यूरिक एसिड बढ़ने से जोड़ों में ठोस क्रिस्टल (crystal) बन सकते हैं। इसकी वजह से गाउट रोग हो सकता है, जो कि बहुत दर्दनाक होता है। अगर गोउट का इलाज न किया जाए तो यह यूरिक एसिड के क्रिस्टल जोड़ों और उनके आसपास के ऊतकों में एकत्रित होकर एक गांठ का रूप ले लेते हैं। इस गाँठ को चिकिस्त्सिये भाषा में "टोफी" (Tophi) कहा जाता है। यूरिक एसिड बढ़ने से गुर्दे की पथरी या गुर्दे खराब होने की समस्या हो सकती है।


(और पढ़ें - गठिया के घरेलू उपाय)


रक्त में यूरिक एसिड के स्तर का पता लगाने के लिए 'ब्लड यूरिक एसिड टेस्ट' किया जाता है।


यूरिक एसिड अधिक होने के प्रकार - Types of High Uric Acid Levels in the Blood in Hindi

रक्त में यूरिक एसिड का उच्च स्तर के चरण - Stages of High Uric Acid Levels in the Blood in Hindi

यूरिक एसिड बढ़ने के लक्षण - High Uric Acid Symptoms in Hindi

यूरिक एसिड बढ़ने के लक्षण - High Uric Acid Symptoms in Hindi

रक्त में यूरिक एसिड बढ़ने के क्या लक्षण होते हैं ?


ऐसा हो सकता है कि यूरिक एसिड बढ़ने पर आपको कोई लक्षण न हों।

यदि आपके रक्त में यूरिक एसिड का स्तर काफी ज़्यादा है और आप ल्यूकेमिया या लिम्फोमा के लिए कीमोथेरेपी ले रहे हैं, तो आपको गुर्दे की समस्याएं हो सकती हैं या गठिया हो सकता है। (और पढ़ें - गठिया के लिए योग)

यदि आपको कैंसर है और आपके रक्त में यूरिक एसिड ज्यादा है, तो आपको बुखार, ठंड लगना व थकान हो सकती है। (और पढ़ें - कैंसर में क्या खाएं)

यदि यूरिक एसिड आपके जोड़ों में जमा हो रहा है, तो आपको गाउट की समस्या शुरू हो सकती है। ध्यान रहे कि गाउट रोग तब भी हो सकता है जब यूरिक एसिड का स्तर नार्मल हो। (और पढ़ें - जोड़ों में दर्द के घरेलू उपाय)

आपको गुर्दे की समस्याएं हो सकती हैं (किडनी स्टोन के कारण)। (और पढ़ें - पथरी में क्या नहीं खाना चाहिए)

आपको पेशाब करने में समस्या शुरू हो सकती हैं।

(और पढ़ें - पेशाब में दर्द क्यों होता है)


यूरिक एसिड बढ़ने का कारण - High Uric Acid Level Causes in Hindi

यूरिक एसिड बढ़ने का कारण - High Uric Acid Level Causes in Hindi

रक्त में यूरिक एसिड क्यों बढ़ता है?


रक्त में यूरिक एसिड बढ़ने के कई कारण हो सकते हैं, जैसे -


अनुवांशिकता।

इंसुलिन विरोध।

शरीर में आयरन ज़्यादा होना। (और पढ़ें - आयरन टेस्ट क्यों किया जाता है)

हाई ब्लड प्रेशर। (और पढ़ें - हाई ब्लड प्रेशर में परहेज)

थायराइड जयादा या कम होना। (और पढ़ें - थायराइड में परहेज)

गुर्दो की खराबी। (और पढ़ें - किडनी को खराब करने वाली आदतें)

मोटापा। (और पढ़ें - मोटापा कम करने के उपाय)

गलत आहार।

अधिक मात्रा में शराब पीना।

(और पढ़ें - शराब की लत का इलाज)


रक्त में यूरिक एसिड के उच्च स्तर के कारणों को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है - यूरिक एसिड का अधिक बनना, यूरिक एसिड का शरीर से बहार निकलना कम होना और मिश्रित प्रकार।


यूरिक एसिड ज्यादा बनना: इसका कारण आहार में प्यूरिन (Purine) ज्यादा होना।

यूरिक एसिड का शरीर से बहार निकलना कम होना: इसका कारण हैं किडनी रोग, कुछ दवाएं और यूरिक एसिड की जगह अन्य अणुओं का शरीर से बाहर निकलना।

मिश्रित प्रकार: इसके कारण हैं अधिक शराब पीना, आहार में अधिक फ्रुक्टोज (fructose; एक प्राकर की शक्कर जो खाद्य पदार्थों में प्राकृतिक रूप से होती है) होना और भुखमरी।

(और पढ़ें - किडनी फंक्शन टेस्ट)


रक्त में यूरिक एसिड बढ़ने का जोखिम किन कारकों की वजह से ज्यादा हो जाता है?


किसी को भी यह समस्या हो सकती है, लेकिन महिलाओं की तुलना में पुरुषों में यह अधिक आम है और उम्र के साथ इसके होने का जोखिम बढ़ जाता है।


इसके जोखिम कारक निम्नलिखित हैं -


शराब पीना। (और पढ़ें - शराब पीने के नुकसान)

कुछ दवाएं, विशेषकर हृदय रोग की दवाएं। (और पढ़ें - हृदय को स्वस्थ रखने वाले आहार)

लीड के संपर्क में आना।

कीटनाशक के संपर्क में आना।

गुर्दे की बीमारी। (और पढ़ें - किडनी इन्फेक्शन का इलाज)

हाई ब्लड प्रेशर। (और पढ़ें - हाई ब्लड प्रेशर डाइट चार्ट)

रक्त में ग्लूकोज ज्यादा होना।

थायराइड कम होना (हाइपोथायरायडिज्म)। (और पढ़ें - थायराइड फंक्शन टेस्ट)

मोटापा।

बहुत अधिक शारीरिक श्रम करना।

(और पढ़ें - वजन कम करने के लिए डाइट टिप्स)


यूरिक एसिड बढ़ने से कैसे रोकें - How to prevent high uric acid level in blood in Hindi

यूरिक एसिड बढ़ने पर जांच - Diagnosis of High Uric Acid in Hindi

यूरिक एसिड बढ़ने पर जांच - Diagnosis of High Uric Acid in Hindi

रक्त में यूरिक एसिड के उच्च स्तर का निदान कैसे होता है ?

 

रक्त में यूरिक एसिड के स्तर मापने के लिए आपके डॉक्टर क्रिएटिनिन के स्तर को मापने के लिए रक्त और मूत्र परीक्षण कर सकते हैं।

 

(और पढ़ें - कैल्शियम यूरिन टेस्ट)

 

इस परीक्षण में रक्त आमतौर पर आपके हाथ की नस से लिया जाता है, ज़्यादातर आपकी कोहनी के अंदर की तरफ या आपके हाथ के पीछे की तरफ से। यूरिक एसिड सामान्य रूप से आपके मूत्र में पाया जाता है, क्योंकि आपके शरीर में इसका उत्सर्जन होता है।

यदि आपके रक्त में यूरिक एसिड का स्तर पाया जाता है, तो आपके डॉक्टर 24-घंटे के मूत्र संग्रह का आदेश दे सकते हैं।

 

(और पढ़ें - ब्लड टेस्ट कैसे होता है)

 

इस मूत्र परीक्षण को फिर से प्यूरिन-प्रतिबंधित आहार के बाद दोहराया जाता है, जो यह निर्धारित करने में सहायता करता है कि क्या -

आप बहुत अधिक उच्च-प्यूरीन मात्रा वाले खाद्य पदार्थ खा रहे हैं।

आपका शरीर बहुत यूरिक एसिड बना रहा है।

आपका शरीर पर्याप्त यूरिक एसिड नहीं निकाल रहा है।

(और पढ़ें - स्टूल टेस्ट क्या है)


यदि आपको गाउट के लक्षण हो रहे हैं, तो आपके डॉक्टर आपके जोड़ों में निर्मित किसी भी तरल पदार्थ का परीक्षण करना चाहेंगे। यह जोड़ों से द्रव को निकालने के लिए एक बारीक सुई के माध्यम से किया जाता है। यह द्रव एक प्रयोगशाला में भेजा जाता है, जहां यूरिक एसिड क्रिस्टल के किसी भी सबूत के लिए इसकी जांच की जाती है। इन क्रिस्टल की उपस्थिति गाउट को इंगित करती है।

 

(और पढ़ें - यूरिक एसिड टेस्ट)

यूरिक एसिड बढ़ने का इलाज - Uric Acid ka ilaj in Hindi

यूरिक एसिड बढ़ने का इलाज - Uric Acid ka ilaj in Hindi

रक्त में यूरिक एसिड के उच्च स्तर का इलाज क्या होता है ?


यदि आपके रक्त में यूरिक एसिड का स्तर ज़्यादा होता है तो आपके डॉक्टर इलाज के लिए आपको निम्नलिखित दवाएं दे सकते हैं -


गैर-स्टेरायडल एंटी-इन्फ्लैमेटरी (एनएसएडी) दवाएं और टाइलनॉल


नैप्रोक्सेन सोडियम और इबुप्रोफेन गाउट संबंधी दर्द से राहत प्रदान कर सकते हैं। गाउट उच्च यूरिक एसिड के स्तर का परिणाम हो सकता है। (और पढ़ें - गठिया के लिए योग)

यदि आप कैंसर या कीमोथेरेपी के कारण एनएसएडी दवाएं नहीं ले सकते हैं, तो आपको एसिटामिनोफेन दी जा सकती है। (और पढ़ें - गुर्दे के कैंसर का इलाज)

यह महत्वपूर्ण है कि टाइलनॉल की बताई गयी दैनिक खुराक से अधिक न लें क्योंकि यह लिवर को नुकसान पहुंचा सकती है।

(और पढ़ें - लिवर खराब होने के कारण)


यूरिकोसुरिक दवाएं


ये दवाएं यूरेट के पुर्नअवशोषण को अवरुद्ध करती हैं, जो यूरिक एसिड क्रिस्टल को आपके ऊतकों में जमा होने से रोक सकता है। यूरिकोसुरिक ड्रग्स के उदाहरणों में प्रोबेनेसिड और सल्फाइन पायराज़ोन शामिल हैं।

(और पढ़ें - गठिया के घरेलू उपाय)


ज़ेनथिन ऑक्सीडेज इनहिबिटर


एलोप्यूरिनॉल जैसे ज़ेनथिन ऑक्सीडेज इनहिबिटर, गाउट से बचाव करते हैं। हालांकि, यह दर्दनाक जोड़ो के सूजन के दौरान आपके लक्षणों को और खराब कर सकते हैं। (और पढ़ें - सूजन का इलाज)

एलोप्यूरिनॉल, कीमोथेरेपी और ट्यूमर रोग सिंड्रोम से जुड़ी जटिलताओं को रोकने के लिए ल्यूकेमिया या लिंफोमा के दौरान भी इसे दिया जा सकता है। (और पढ़ें - ब्लड कैंसर ट्रीटमेंट)

आपकी बीमारी के परिणामस्वरूप रक्त में यूरिक एसिड के उच्च स्तर से यूरिक एसिड आपके गुर्दे में एकत्रित हो सकती है और आपके गुर्दे के असफल होने का कारण बन सकती है।

(और पढ़ें - गुर्दे की प्रत्यारोपण सर्जरी)


यूरिक एसिड बढ़ने से क्या होता है - High Uric Acid Complications in Hindi

यूरिक एसिड बढ़ने से क्या होता है - High Uric Acid Complications in Hindi

रक्त में यूरिक एसिड का स्तर बढ़ने से क्या परेशानियां होती हैं?


रक्त में यूरिक एसिड के उच्च स्तर की जटिलताएं निम्नलिखित हैं -


गाउट।

एक्यूट यूरिक एसिड नेफ्रोपैथी।

यूरिक एसिड नेफ्रोलिथियासिस (nephrolithiasis)।

क्रॉनिक गुर्दे की बीमारी।

(और पढ़ें - परक्यूटेनियस नेफ्रोलिथोटॉमी)


रक्त में यूरिक एसिड का उच्च स्तर में परहेज़ - What to avoid during High Uric Acid Levels in the Blood in Hindi?

रक्त में यूरिक एसिड का उच्च स्तर में क्या खाना चाहिए? - What to eat during High Uric Acid Levels in the Blood in Hindi?

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कैल्शियम की कमी

कैल्शियम की कमी क्या है?


कैल्शियम  एक महत्वपूर्ण मिनरल (खनिज) होता है। आपका शरीर दांतों और हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए इसका इस्तेमाल करता है। शरीर का 99 प्रतिशत से भी ज्यादा कैल्शियम दांतों और हड्डियों में ही होता है, जो कंकाल की संरचना और उसके कार्यों को सपोर्ट प्रदान करता है। शरीर में बाकी बचा हुआ 1 प्रतिशत कैल्शियम अन्य महत्वपूर्ण कार्यों में सहायता करता है, जैसे मांसपेशियों का संकुचन, धमनियों का संकुचन व विस्तार और तंत्रिका प्रणाली के माध्यम से शरीर के अन्य भागों में संदेश पहुंचाना। हृदय व शरीर के अन्य हिस्सों को भी ठीक से काम करने के लिए कैल्शियम की जरूरत पड़ती है।


जब आपका शरीर पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम नहीं प्राप्त कर पाता, तो आपके शरीर में कुछ विकार विकसित होने का जोखिम बढ़ जाता है, जैसे ​कि ओस्टियोपोरोसिस या ​ओस्टियोपेनिया।


जिन बच्चों को पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम नहीं मिल पाता, उनकी बड़े होने पर लम्बाई कम रह सकती है। जिन लोगों में कैल्शियम की कमी होती है उनमें हलके से गंभीर लक्षण व विकार हो सकते हैं। इसके लक्षणों में हाथों और पैरों का सुन्न होना, झुनझनी महसूस होना, मांसपेशियों में दर्द, बेहोशी, डिप्रेशन, दांतों में सड़न और रूखी त्वचा आदि शामिल हैं।


(और पढ़ें - रूखी त्वचा के लिए घरेलू उपाय)


डॉक्टर आपके लक्षणों के आधार पर कैल्शियम की कमी की जांच करते हैं। खून में कैल्शियम की मात्रा को मापने के लिए डॉक्टर आपको ब्लड टेस्ट करवाने को भी कह सकते हैं।


यदि जांच में कैल्शियम की कमी की समस्या पाई गई है तो आपको रोजाना के खाद्य पदार्थों, सप्लीमेंट्स और विटामिन आदि से सही मात्रा में कैल्शियम प्राप्त करना जरूरी होता है। इसकी मदद से कैल्शियम में कमी होने से रोकथाम की जा सकती है। कोई भी दवा या सप्लीमेंट डॉक्टर से पूछ कर ही लें।


कैल्शियम की खुराक - Calcium requirement per day in Hindi

कैल्शियम की खुराक - Calcium requirement per day in Hindi

रोजाना कैल्शियम की कितनी मात्रा का सेवन करना चाहिए?


बच्चों से बूढ़ों तक हर किसी को कैल्शियम की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन उम्र, स्वास्थ्य व अन्य कई स्थितियों के अनुसार कैल्शियम की खुराक कम या ज्यादा हो सकती है। नीचे टेबल में स्थिति के अनुसार कैल्शियम की सही मात्रा बताई गयी है:


उम्र    पुरुष    महीला    गर्भावस्था    स्तनपान

0 से 6 महीने    200 एमजी    200 एमजी         

7 से 12 महीने    260 एमजी    260 एमजी         

1 से 3 साल    700 एमजी    700 एमजी         

4 से 8 साल    1,000 एमजी    1,000 एमजी         

9 से 13 साल    1,300 एमजी    1,300 एमजी         

14 से 18 साल    1,300 एमजी    1,300 एमजी    1,300 एमजी    1,300 एमजी

19 से 50 साल    1,000 एमजी    1,000 एमजी    1,000 एमजी    1,000 एमजी

51 से 71 साल    1,000 एमजी    1,200 एमजी         

71 साल के ऊपर की उम्र    1,200 एमजी             

 


कैल्शियम की कमी के चरण - Stages of Calcium deficiency in Hindi

कैल्शियम की कमी के लक्षण - Calcium deficiency Symptoms in Hindi

कैल्शियम की कमी के लक्षण - Calcium deficiency Symptoms in Hindi

कैल्शियम में कमी होने पर क्या लक्षण दिखाई देते हैं?


शरीर में कैल्शिम की कमी होने पर लक्षण तुरंत नहीं दिखते हैं, क्योंकि शरीर हड्डियों से कैल्शियम निकालकर खून में कैल्शियम के स्तर को निंयत्रित करता रहता है। हालांकि, यदि कैल्शियम की कमी लम्बे समय तक चलती रहे, तो परिणाम गंभीर हो सकते हैं।


जिन लोगों में कैल्शियम की कमी होती है, अक्सर उनमें निम्न लक्षण दिखाई देते हैं:


अनिद्रा

सुस्ती या लगातार थकान रहना

ठीक से भूख ना लगना

थकान

हाथों सुन्न होना

मिसकैरेज

बांझपन

मिर्गी के दौरे

त्वचा में रूखापन

कमजोर याददाश्त

मोतियाबिंद

एलर्जी

छाती में दर्द

हाई कोलेस्ट्रोल का स्तर

दांतों में सड़न

मसूड़ों के रोग

कमजोर और खराब आकार के नाखून

दिल घबराना या दिल असामान्य रूप से धड़कना

हाई ब्लड प्रेशर के जोखिम

कैल्शियम की कमी के कारण - Calcium deficiency Causes in Hindi

कैल्शियम की कमी के कारण - Calcium deficiency Causes in Hindi

कैल्शियम की कमी क्यों होती है?


शरीर में कैल्शियम के स्तर में कमी करने वाली कई वजह हो सकती हैं। ज्यादातर लोगों में अक्सर आहार में पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम ना लेने के कारण भी कैल्शियम में कमी होने लगती है।


इसके अलावा अन्य कारण निम्न हो सकते हैं:


आहार में अत्याधिक फॉसफोरस या मैग्नीशियम का सेवन करना या पेट के अम्लों का रिसाव पर्याप्त मात्रा में ना होना (यह स्थिति खासकर बुजुर्गों में होती है) आदि भी कैल्शियम में कमी कर सकते हैं।

विटामिन डी, कैल्शियम के अवशोषण और उसको उपयोग करने की प्रक्रिया को आसान बना देता है। यदि विटामिन डी में कमी है तो ऐसे में भी कैल्शियम का स्तर कम लग जाता है।

खाद्य पदार्थों से कैल्शियम का अवशोषण कम होना, कैल्शियम का ठीक से उपयोग ना कर पाना, या मल-मूत्र के साथ अधिक कैल्शियम निकल जाना।

सॉफ्ट ड्रिंक्स जो जिनमें अधिक मात्रा में फॉसफोरस होता है, परिष्कृत अनाज, मीट आदि भी कैल्शियम में कमी होने का कारण बनते हैं।

महीला एथलीट (खिलाड़ी) और रजोनिवृत्ति का चरण शुरू कर चुकी महिलाओं को कैल्शियम की ज्यादा मात्रा चाहिए होती है, क्योंकि उनमें एस्ट्रोजन (Estrogen) का स्तर कम होता है। एस्ट्रोजन एक प्रकार का हार्मोन होता है जो हड्डियों में कैल्शियम को जमनें में मदद करता है।

बहुत ज्यादा व्यायाम करना भी कैल्शियम के स्तर को बढ़ने से रोकता है, जबकि हल्का व्यायाम करना कैल्शियम को बढ़ने में मदद करता है।

शारीरिक रूप से निष्क्रियता (खासकर उस समय में जब आपको कम्प्लीट बेड रेस्ट दिया गया है) की वजह से भी कैल्शियम में कमी होने लग जाती है। ऑस्टियोपोरोसिस की रोकथाम करने में व्यायाम करना एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अधिक मात्रा में वसा, प्रोटीन या शुगर से भरपूर आहार खाना भी कैल्शियम के स्तर को घटा सकता है। चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक, तंबाकू, शराब, रिफाइंड शुगर और अत्याधिक नमक का सेवन करना भी कैल्शियम में कमी पैदा कर देता है।

जोखिम कारक –


जो लोग नीचे दिए गए जोखिम कारकों से जुड़े हैं उनमें सामान्य लोगों के मुकाबले कैल्शियम की कमी होने के जोखिम अधिक होते हैं:


पोस्टमेनोपॉजल (रजोनिवृत्ति उपरांत) महिलाऐं – जो महीलाएं अत्याधिक मात्रा में कैफीन, कोल्ड ड्रिंक या शराब आदि का सेवन करती हैं, उनमें कैल्शियम की कमी होने के अत्याधिक जोखिम होते हैं।

जो लोग लंबे समय से कोर्टिकोस्टेरॉयड दवाएं ले रहे हैं।

शाकाहारी लोग

जो लोग डेयरी उत्पादों को न पचा पाने के कारण उनका सेवन बहुत ही कम करते हैं। (और पढ़ें - लैक्टोज असहिष्णुता के आयुर्वेदिक इलाज)

जो लोग अत्याधिक मात्रा में प्रोटीन या सोडियम वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं, जिस कारण से शरीर अत्याधिक मात्रा में कैल्शियम को बाहर निकालने लग जाता है।

जिनको ओस्टियोपोरोसिस है

जिनको कुछ निश्चित प्रकार की आंत या पाचन संबंधी रोग हैं, जो कैल्शियम को अवशोषित करने की क्षमता को कम कर देते हैं, जैसे इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज या सेलिएक रोग

जिनकी किडनी खराब हो गयी हो

जिन्हे ​अग्नाशयशोथ (pancreatitis) हो

जो सीलिएक रोग, इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (आईबीडी), क्रोन रोग या कुछ अन्य प्रकार के पाचन संबंधी रोग से ग्रस्त हों।

जिनका ऑपरेशन से पेट का कुछ हिस्सा निकाल दिया गया हो।

जो विटामिन डी या फॉस्फेट की कमी से ग्रस्त हों

वे लोग जिन्हे कुछ प्रकार के कैंसर में से कोई हो

कैल्शियम की कमी से बचाव - Prevention of Calcium deficiency in Hindi

कैल्शियम की कमी से बचाव - Prevention of Calcium deficiency in Hindi

कैल्शियम की कमी होने से कैसे रोकें?


नीचे बताई गई आदतों का पालन करने से कैल्शियम की कमी होने से रोकी जा सकती है:


चीज़ या पनीर खाएं – क्योंकि चीज़ और पनीर कैल्शियम के बेहतरीन स्रोत हैं।

अधिक विटामिन डी प्राप्त करें – शरीर में विटामिन डी की आपूर्ति के लिए धूप के सपर्क में रहना महत्वपूर्ण होता है।

नमक का सेवन कम करें – नमक का सेवन करने से ब्लड प्रेशर का स्तर हाई हो सकता है, जो वॉटर रिटेंशन (जल प्रतिधारण) होने में भी मदद करता है। साथ ही साथ नमक आपके शरीर में कैल्शियम के स्तर को भी प्रभावित करता है। (और पढ़ें - नमक के फायदे)

धूम्रपान छोड़ें – धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के शरीर में कैल्शियम का स्तर सामान्य से कम देखा गया है। (और पढ़ें - धूम्रपान छोड़ने के घरेलू उपाय)

आपको अधिक डेयरी उत्पादों का सेवन करना चाहिए, क्योंकि शरीर इनमें से कैल्शियम को अन्य पौधों आदि के मुकाबले आसानी से अवशोषित कर लेता है।


कैल्शियम कई भिन्न-भिन्न खाद्य व पेय पदार्थों में पाए जाते हैं। डॉक्टर यह सुझाव भी देते हैं कि कैल्शियम को कई अलग-अलग पदार्थों से प्राप्त करना चाहिए। नीचे कुछ खाद्य व पेय पदार्थ दिए गए हैं जिनमें भरपूर मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है:


टोफू

सिंहपर्णी के पत्ते

दूध

सूखे मेवे व बीज जिसमें पिस्ता, तिल, बादाम भी शामिल हैं।

फलियां

पनीर

दही

अंजीर

ब्रोकोली

पालक

अन्य कई प्रकार के पेय जैसे सोया दूध या कई प्रकार के फलों के रस जिनमें पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम पाया जाती है।

कुछ गहरे हरें रंग की पत्तियों वाली सब्जियों का सेवन करने से शरीर की कैल्शियम अवशोषित करने की क्षमता में कमी आ सकती है।


कैल्शियम की कमी का परीक्षण - Diagnosis of Calcium deficiency in Hindi

कैल्शियम की कमी का परीक्षण - Diagnosis of Calcium deficiency in Hindi

कैल्शियम में कमी की समस्या की जांच कैसे की जाती है?


आपके डॉक्टर आपकी पिछली मेडिकल स्थिती के बारे में जानेंगे और आपसे पूछेंगे कि कहीं परिवार में किसी को कैल्शियम की कमी या ओस्टियोपोरोसिस की समस्या तो नहीं।


यदि डॉक्टर को आपमें कैल्शियम की कमी होने का संदेह होता है, तो वे खून में कैल्शियम का स्तर जानने के लिए आपको ब्लड टेस्ट करवाने को कहेंगे। इस टेस्ट से टोटल कैल्शियम लेवल, आपका एल्बुमिन लेवल, आपके शरीर में आयोनाइज्ड या फ्री कैल्शियम लेवल का पता चलता है। एल्बुमिन एक प्रकार का प्रोटीन होता है जो कैल्शियम के सें बंधा या जुड़ा होता है और रक्तस्त्राव में घूमता रहता है। खून में कैल्शियम का निम्न स्तर बना रहना, कैल्शियम की कमी होने के परीक्षण की पुष्टी करता है।


वयस्कों के लिए सामान्य कैल्शियम लेवल 8.8 से 10.4 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर (mg/dL) होता है। यदि आपके कैल्शियम का स्तर 8.8 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर से कम है तो आपमें कैल्शियम की कमी होने के उच्च जोखिम हैं।


कैल्शियम की कमी का इलाज - Calcium deficiency Treatment in Hindi

कैल्शियम की कमी का इलाज - Calcium deficiency Treatment in Hindi

कैल्शियम की कमी को कैसे दूर करें?


कैल्शियम की कमी की का इलाज करना आमतौर पर आसान होता है। इसके लिए आमतौर पर आहार में कैल्शियम की मात्रा को बढ़ाना होता है। आमतौर पर मरीजों को कैल्शियम के सप्लीमेंट्स लेने की भी सलाह दी जाती है।


कैल्शियम के सप्लीमेंट का सेवन दिनभर थोड़ा-थोड़ा करना चाहिए, आमतौर पर दो या तीन बार। कैल्शियम के काफी सप्लीमेंट्स में विटामिन डी को भी शामिल किया जाता है, क्योंकि यह शरीर में प्रोटीन के संश्लेषण को बढ़ाता है, जिससे कैल्शियम का अवशोषण होना बढ़ जाता है।


आजकल सही सप्लीमेंट का चुनाव करना आसान नहीं है क्योंकि अब बहुत अलग-अलग प्रकार के सप्लीमेंट उपलब्ध हैं। इनमें से किसी का भी चुनाव करना मरीज की आवश्यकता, उनकी मेडिकल स्थिति, उनकी पसंद और क्या वे कोई अन्य दवाई ले रहे हैं या नहीं आदि पर निर्भर करता है। बिना डॉक्टर की मदद से किसी कैल्शियम सप्लीमेंट का सेवन करके खुद ही अपना इलाज करने की कोशिश न करें। डॉक्टर के द्वारा बताये गए सप्लीमेंट या किसी दवा की खुराक से ज्यादा मात्रा में लेना गंभीर रोग को पैदा कर सकता है जैसे गुर्दे की पथरी।


(और पढ़ें - पथरी का दर्द)


आमतौर पर ज्यादा इस्तेमाल किये जाने वाले सप्लीमेंट्स इस प्रकार हैं:


कैल्शियम सिटरेट, यह आसानी से अवशोषित हो जाता है।

कैल्शियम फॉस्फेट, यह आसानी से अवशोषित हो जाता है और ना ही कब्ज पैदा करता।

कैल्शियम कार्बोनेट, यह अधिक महंगा नहीं होता।

कभी-कभी आहार में परिवर्तन और सप्लीमेंट्स कैल्शियम की कमी को ठीक करने के लिए काफी नहीं होते। इन मामलों में, डॉक्टर आपको कैल्शियम का इन्जेक्शन देकर भी आपके कैल्शियम स्तर को नियमित कर सकते हैं।


उपचार शुरू होने के कुछ हफ्तों में आपको रिजल्ट महसूस होना शुरू हो जाता है। यदि कैल्शियम की गंभीर रूप से कमी है तो इस समस्या पर एक से तीन महीने पर नजर रखी जाती है।


कैल्शियम की कमी से होने वाले रोग और बीमारी - Disease caused by Calcium deficiency in Hindi

कैल्शियम की कमी से होने वाले रोग और बीमारी - Disease caused by Calcium deficiency in Hindi

कैल्शिम में कमी होने से कौन से रोग या समस्याएं विकसित हो सकती हैं?


रिकेट्स (सूखा रोग) – ​

सूखा रोग में हड्डियां इतनी नरम और इतनी लचकदार हो जाती हैं कि वह मुड़ने लगती हैं। इससे "नॉक नीज" (Knock Knees), "बो लेग" (Bowed Legs), पीठ टेढ़ी हो जाना, टखने और कलाइयों का आकार बढ़ना, छाती संकुचित होना, माथा बाहर की तरफ उभड़ जाना, खोपड़ी की हड्डियां नरम होना और जोड़ों के बीच की जगह अधिक हो जाना जैसी समस्याएं हो जाती हैं।

 

ओस्टियोपोरोसिस – 

इस रोग में हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और बार-बार टूटने लग जाती हैं। क्योंकि जब खून में कैल्शियम की कमी होती है, तो कैल्शियम की आपूर्ति करने के लिए शरीर हड्डियों से कैल्शियम को खींचने लग जाता है जिससे हड्डियों में ये उपरोक्त समस्याएं होने लगती हैं। (और पढ़ें - फ्रैक्चर के लक्षण​)

 

टेटनी​ (Tetany) – 

खून में कैल्शियम का स्तर बहुत कम होने से टेटनी रोग हो सकता है। इसमें नसों की गतिविधी अत्याधिक बढ़ जाती है जिस कारण मांसपेशियों में संकुचन आने लगता है। इसके लक्षणों में उंगलियों, अंगूठों या होठों पर झुनझुनी, बाहों तथो टांगों में सुन्नपन आदि से लेकर गंभीर मांसपेशियों में ऐंठन व गांठ हो सकती है। अति गंभीर मामलों में मौत तक हो सकती है।

 

ओस्टियोमेलासिया (Osteomalacia​) –

यह रोग हड्डियों को नरम बना देता है जिससे हड्डियों में फ्रैक्चर आने की संभावना अधिक बढ़ जाती है। इसके लक्षणों में रीढ़ की हड्डी व हाथों-पैरों में विकृति होना और गठिया रोग जैसा दर्द महसूस होना आदि शामिल होता है।

 

रूमेटाइड अर्थराइटिस –

रूमेटाइड आर्थराइटिस एक स्व-प्रतिरक्षित रोग होता है जो ऊतकों में क्षति और जोड़ों में दीर्घकालिक सूजन, जलन व लालिमा पैदा करने का कारण बनता है। इससे सूजन के साथ-साथ जोड़ों में गंभीर दर्द भी होता है।

कैल्शियम की कमी में परहेज़ - What to avoid during Calcium deficiency in Hindi?

कैल्शियम की कमी में क्या खाना चाहिए? - What to eat during Calcium deficiency in Hindi?

vit b 12

विटामिन बी 12 की कमी

विटामिन बी12 की कमी क्या है? 


विटामिन बी12 एक अनिवार्य विटामिन है जिसे शरीर खुद नहीं बना सकता। विटामिन बी12 को कोबालामिन (cobalamin) के नाम से भी जाना जाता है। हमारा शरीर नियमित रूप से विटामिन बी12 प्राप्त करने के लिए आहार पर निर्भर है। विटामिन बी12 लीवर में जमा रहता है ताकि यदि कभी इसकी थोड़ी-बहुत कमी हो तो इसकी पूर्ति हो सके। जब विटामिन बी12 की मात्रा बेहद कम हो जाती है तभी ज्यादा गंभीर लक्षण उभरने शुरू होते हैं और ऐसा होने में संभव है बरसों लग जाएँ।


(और पढ़ें - विटामिन बी के प्रकार)


विटामिन बी12 आपके शरीर के लिए कई तरह के काम करता है। यह आपका डीएनए और लाल रक्त कोशिकाएं बनाने में मदद करता है।


उम्र बढ़ने के साथ इस विटामिन को अवशोषित करना कठिन हो जाता है। ऐसा तब भी हो सकता है यदि आपने वज़न घटाने के लिए ऑपरेशन कराया हो या फिर कोई ऐसा ऑपरेशन हुआ हो जिसमें पेट का कोई हिस्सा निकाला गया हो या आप बहुत शराब पीते हों या फिर आपने लम्बे समय तक एंटासिड (एसिडिटी की दवा) ली हो।


विटामिन बी12 का पर्याप्त मात्रा में न होना विटामिन बी12 की कमी (विटामिन बी12 डेफिशियेंसी एनीमिया) कहलाता है। ऐसी स्थिति में शरीर सामान्य से बड़े आकर की लाल रक्त कोशिकाएँ बनाता है, जो आपना काम ठीक से नहीं कर पाती हैं।


(और पढ़ें - एनीमिया से बचने के उपाय)


खून की जांच और माइक्रोस्कोप से रक्त कोशिकाओं की जांच से हीमोग्लोबिन के स्तर, लाल रक्त कोशिकाओं और खून में विटामिन बी12 के स्तर का आकलन होता है। विटामिन बी12 की कमी का इलाज इस पर निर्भर करता है कि डॉक्टर इसकी वजह क्या पाते हैं। ज्यादातर लोगों के लिए पर्याप्त मात्रा में विटामिन बी12 प्राप्त करने के लिए संतुलित भोजन काफी होता है। विटामिन बी12 पूरक टेबलेट भी लेने की सलाह दी जा सकती है।


(और पढ़ें - हीमोग्लोबिन क्या होता है)


विटामिन बी की 12 खुराक - Vitamin B12 Requirement per day in Hindi

विटामिन बी की 12 खुराक - Vitamin B12 Requirement per day in Hindi

विटामिन बी12 रोजाना कितनी मात्रा में लेना चाहिए?


पुरुषों और महिलाओं को विटामिन बी12 की अलग-अलग मात्रा की आवश्यकता होती है। इसके अलावा आपकी उम्र और स्वास्थ्य के अनुसार भी इसकी जरूरत अलग हो सकती है। 


इस टेबल में इन स्थितियों के अनुसार विटामिन बी 12 की सही दैनिक खुराक बताई गई है:


उम्र    पुरुष    महिला    गर्भावस्था    स्तनपान

0 से 6 महीने    0.4 एमसीजी    0.4 एमसीजी         

7 से 12 महीने    0.5 एमसीजी    0.5 एमसीजी         

1 से 3 साल    0.9 एमसीजी    0.9 एमसीजी         

4 से 8 साल    1.2 एमसीजी    1.2 एमसीजी         

9 से 13 साल    1.8 एमसीजी    1.8 एमसीजी         

14 या उससे ऊपर के साल    2.4 एमसीजी    2.4 एमसीजी    2.6 एमसीजी    2.8 एमसीजी

विटामिन बी 12 की कमी के चरण - Stages of Vitamin B12 Deficiency in Hindi

विटामिन बी 12 की कमी के लक्षण - Vitamin B12 Deficiency Symptoms in Hindi

विटामिन बी 12 की कमी के लक्षण - Vitamin B12 Deficiency Symptoms in Hindi

विटामिन बी12 की से जुड़े कुछ विशेष लक्षण:


त्वचा का पीला पड़ना (और पढ़ें - पीलिया में क्या खाएं)

जीभ में लालिमा व दाना निकलना

मुंह में छाले (और पढ़ें - मुंह के छाले के घरेलू उपाय)

स्पर्श की संवेदना में कमी या बदलाव

धुंधला दिखना

नजर कमजोर होना

चाल-ढाल में बदलाव

चित्त का अस्थिर होना (मूड बदलना), चिड़चिड़ापन , डिप्रेशन या मनोविकार आदि (और पढ़ें - डिप्रेशन को कैसे खत्म करे)

याददाश्त, समझ-बूझ और निर्णय लेने जैसी मानसिक क्षमताओं में कमी

डिमेंशिया (मनोभ्रंश)

विटामिन बी12 की कमी से एनीमिया हो सकता है, जिसके लक्षण हैं: 


अत्याधिक थकान या सुस्ती (और पढ़ें - थकान दूर करने का तरीका)

कमजोरी या सुस्ती महसूस होना

सांस फूलना (और पढ़ें - सांस फूलने के उपाय)

बेहोशी सा महसूस होना

सिरदर्द (और पढ़ें – सरदर्द के उपाय)

कान बजना (Tinnitus)

भूख कम लगना

(और पढ़ें - बच्चों में भूख न लगने के कारण)


डॉक्टर को कब दिखाएँ?


यदि आप विटामिन बी12 की कमी से हुए एनीमिया के लक्षण महसूस कर रहे हैं तो अपने डॉक्टर से मिलें। इसका पता आपके लक्षणों और खून की जाँच की रिपोर्ट के आधार पर लगाया जा सकता है।


विटामिन बी12 की कमी का जल्द से जल्द निदान और इलाज महत्वपूर्ण है। हालांकि बहुत से लक्षण इलाज से ठीक हो जाते हैं, लेकिन इलाज न हो तो इससे पैदा परेशानी लाइलाज हो सकती है। इलाज में जितनी देरी हो, स्थाई नुकसान की आशंका उतनी अधिक हो सकती है।


विटामिन बी 12 की कमी के कारण और जोखिम - Vitamin B12 Deficiency Causes & Risks in Hindi

विटामिन बी12 की कमी क्यों होती है?


1. आहार में विटामिन बी12 का कम होना


विटामिन बी12 की कमी की आम वजह है आहार में विटामिन बी12 का कम होना। विटामिन बी12 ऐसा पोषक तत्व है जो सिर्फ मांस, मछली, अंडे और दूध तथा दुग्ध-उत्पादों जैसे पशुओं से मिलने वाले आहार में उपलब्ध होता है।


यदि आप निरा शाकाहारी हैं (अर्थात, आप मीट, दूध, पनीर और अंडे समेत पशुओं से मिलने वाले किसी भी प्रकार के आहार का सेवन नहीं करते हैं) तो आपको विटामिन बी12 की कमी हो सकती है। 


2. कम अवशोषण


विटामिन बी12 का अवशोषण छोटी आंत के जरिये होता है लेकिन इससे पहले का काम पेट (अमाशय) करता है। इसलिए कुछ स्थितियां जो पेट या छोटी आंत को प्रभावित करती हैं, वे विटामिन बी12 के ठीक तरीके से अवशोषण में बाधा डाल सकती हैं।


ज्यादा शराब पीने से पेट की अंदरूनी परतें प्रभावित हो जाती हैं, जिससे बी12 का अवशोषण बाधित होता है और इसकी कमी हो जाती है।


क्रोन रोग (Crohn's) और सीलिएक रोग (Celiac) जैसे आंत के रोग, छोटी आंत में विटामिन बी12 का उचित अवशोषण बाधित कर सकते हैं जिससे आहार में पर्याप्त विटामिन बी12 मौजूद होने के बावजूद इसकी कमी हो सकती है।


कुछ दवाएं विटामिन बी12 का अवशोषण बाधित कर सकती हैं। आम तौर पर ली जाने वाली दवाएं जिनके कारण विटामिन बी12 का स्तर कम हो सकता है, वे हैं:


मेटफॉर्मिन (Metformin): मधुमेह (डायबिटीज) की दवा (और पढ़ें - डायबिटीज का घरेलू नुस्खा)

कोल्चिसीन (Colchicine): गाउट (Gout) की दवा

क्लोरैम्फेनिकॉल (Chloramphenicol):  संक्रमण दूर करने के लिए उपयुक्त एंटीबायोटिक

सीने में जलन से जुड़ी कई दवाएं (और पढ़ें - सीने में जलन दूर करने के घरेलू नुस्खे)

विटामिन बी 12 की कमी होने की आशंका किन वजहों से बढ़ सकती है?


निम्न स्थितियों में विटामिन बी12 की कमी की संभावना बढ़ जाती है:


बुजुर्गों में विटामिन बी12 की कमी आम है

एट्रोफिक गेस्ट्राइटिस (Atrophic Gastritis) जिसमें पेट की अंदरूनी परतें पतली पड़ जाती हैं

पेट का अल्सर (और पढ़ें - पेट के अल्सर के उपाय)

पेट या छोटी आंत के किसी हिस्से को हटाने के लिए ऑपरेशन

परनीशियस एनीमिया (Pernicious Anaemia) से शरीर में विटामिन बी12 का अवशोषण कठिन हो जाता है

 ग्रेव्स रोग (Grave's disease) जैसी प्रतिरक्षा प्रणाली सम्बन्धी बीमारी (और पढ़ें - इम्यून सिस्टम मजबूत करने के उपाय)

बदहजमी की दवाएं

(और पढ़ें - अपच दूर करने के घरेलू उपाय)


विटामिन बी 12 की कमी से बचाव - Prevention of Vitamin B12 Deficiency in Hindi

विटामिन बी 12 की कमी से बचाव - Prevention of Vitamin B12 Deficiency in Hindi

विटामिन बी12 की कमी होने से कैसे बचें?


निरे शाकाहारी (जो अंडा तक नहीं खाते) अतिरिक्त विटामिन बी12 युक्त अनाज़ (Fortified Breakfast Cereal) और पूरक आहार का सेवन  कर बी12 की कमी दूर कर सकते हैं।


आम तौर पर लोग दुग्ध उत्पाद, मांस-मछली युक्त संतुलित आहार के ज़रिये बी12 के सभी अवयव प्राप्त कर कर सकते हैं। यह पौधों से प्राप्त भोजन में नहीं पाया जाता है।


विटामिन बी12 के कुछ अच्छे भोज्य स्रोत:


सूअर का मांस (पोर्क)

हैम (ham)

चिकन (और पढ़ें - चिकन के फायदे)

भेड़ का मांस

मछली (और पढ़ें - मछली खाने के लाभ)

दुग्ध उत्पाद जैसे दूध, दही, पनीर आदि (और पढ़ें - दूध पीने के फायदे)

कुछ पौष्टिक खमीर उत्पाद

अंडे (और पढ़ें - अंडे खाने के फायदे)

सोया से बना दूध (सोया मिल्क) और अतिरिक्त  विटामिन-खनिज युक्त अनाज (Breakfast Cereals) विटामिन बी12 से भरपूर होते हैं।


इलाज की जरूरत पड़े इससे पहले संतुलित आहार के जरिये आवश्यक मात्रा में पोषक तत्व प्राप्त करना हमेशा बेहतर होता है। स्वास्थ्यवर्धक आहार का सेवन कर बी12 की कमी से होने वाली परेशानियों से आसानी से बचा जा सकता है।


 (और पढ़ें - सोया के फायदे)


विटामिन बी 12 की कमी का निदान - Diagnosis of Vitamin B12 Deficiency in Hindi

विटामिन बी 12 की कमी का निदान - Diagnosis of Vitamin B12 Deficiency in Hindi

विटामिन बी 12 की कमी की जांच कैसे होती है ?


आपके डॉक्टर पहले शारीरिक परीक्षण, मसलन तेज नब्ज और त्वचा की रंगत आदि की जांच करेंगे ताकि विटामिन बी12 की कमी के संकेत देखे जा सकें।


खून की जांच की जा सकती है ताकि लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या और उनके आकार का पता लगाया जा सके। बी12 की कमी वाले लोगों में लाल रक्त कोशिकाएँ अपेक्षाकृत बड़ी होती हैं जो सामान्य से बड़ी दिखती हैं। (और पढ़ें - विटामिन डी टेस्ट)

खून में विटामिन बी12 की कमी के कारण का पता लगाने के लिए अन्य जांच की जरूरत होती है। (और पढ़ें - विटामिन बी12 टेस्ट)

निदान की पुष्टि के लिए कभी-कभार अस्थि-मज्जा (बोन मैरो) की बायोप्सी (जांच के लिए नमूना लेना) की जा सकती है। इसका उपयोग एनीमिया और रक्त कोशिकाओं में असामान्यता की अन्य वजहों को दरकिनार करने के लिए किया जाता है।  (और पढ़ें - बिलीरुबिन टेस्ट)

विटामिन बी 12 की कमी का उपचार - Vitamin B12 Deficiency Treatment in Hindi

विटामिन बी 12 की कमी का उपचार - Vitamin B12 Deficiency Treatment in Hindi

विटामिन बी 12 का उपचार क्या है?


विटामिन बी12 की कमी का इलाज इस पर निर्भर करता है कि ऐसा किस वजह से हुआ है। आम तौर पर इलाज उस विटामिन का इंजेक्शन या टेबलेट देकर किया जा सकता है जिसकी शरीर में कमी है।


विटामिन बी12 की कमी से होने वाले एनीमिया का इलाज –


विटामिन बी12 की कमी से होने वाले एनीमिया का इलाज आमतौर पर विटामिन बी12 के इन्जेक्शन के जरिये किया जाता है जिसे हाइड्रोक्सोकोबालामिन (Hydroxocobalamin) कहते हैं।


सबसे पहले ये इंजेक्शन दो सप्ताह तक हर दूसरे दिन या आपके लक्षण में सुधार शुरू होने तक लगाये जाते हैं।


इस शुरूआती अवधि के बाद आपका इलाज इस पर निर्भर करेगा कि कहीं आपके शरीर में विटामिन बी12 की कमी आपके भोजन से तो जुड़ी नहीं है। विटामिन बी12 की कमी की सबसे आम वजह है परनीशियस एनीमिया जो आहार से जुड़ा नहीं होता।


(और पढ़ें - एनीमिया क्या है)


आहार सम्बन्धी एनीमिया –


यदि आपके शरीर में विटामिन बी12 की कमी असंतुलित आहार होने के कारण हुई है तो भोजन के बीच विटामिन बी12 के टेबलेट लेने की सलाह दी जा सकती है या फिर आपको साल में दो बार हाइड्रोक्सोकोबालामिन (hydroxocobalamin) का इंजेक्शन भी दिया जा सकता है।


(और पढ़ें - संतुलित आहार का महत्व)


जिनके लिए अपने आहार से पर्याप्त मात्रा में विटामिन बी12 प्राप्त करना मुश्किल होता है, मसलन निरे शाकाहारी, उन्हें आजीवन विटामिन बी12 टेबलेट लेने की ज़रुरत पड़ सकती है।


यदि किसी के शरीर में लम्बे समय तक असंतुलित भोजन करने के कारण विटामिन बी12 की कमी पैदा हुई हो, जो कि आम तौर पर नहीं होता, तो उन्हें विटामिन बी12 का स्तर सामान्य होने और आहार में सुधार के बाद टेबलेट बंद करने की सलाह दी जाती है।


यदि आप शाकाहारी हैं या विकल्प के तौर पर आपको  मांस व दुग्ध उत्पादों की जगह कुछ अन्य भोज्य पदार्थों की तलाश है, तो ऐसे कुछ अन्य खाद्य पदार्थ उपलब्ध हैं जिनमें विटामिन बी12 होता है जैसे, अतिरिक्त विटामिन और खनिज युक्त अनाज (fortified breakfast cereal)।


आहारेतर एनीमिया –


यदि आपके शरीर में विटामिन बी12 की कमी आहार में इसके अभाव के कारण नहीं हुई है तो आपको आम तौर पर आजीवन हर तीन महीने पर हाइड्रोक्सोकोबालामिन का इन्जेक्शन लगवाना पड़ सकता है।


विटामिन बी 12 में कमी के कारण यदि आपको तंत्रिका तंत्र सम्बन्धी लक्षण जैसे, हाथ-पैर सुन्न होना या झुनझनी आदि, महसूस हो रहे हैं तो हर दूसरे महीने हाइड्रोक्सोकोबालामिन का इंजेक्शन लगवाने की जरूरत पड़ सकती है।


ज्यादातर लोग इलाज से ठीक हो जाते हैं, लेकिन यदि विटामिन बी12 की कमी के कारण किसी नस को नुकसान हो गया हो तो यह असर स्थाई हो सकता है।


(और पढ़ें - न्यूरोपैथी के लक्षण)


विटामिन बी 12 की कमी से होने वाले रोग - Disease caused by Vitamin B12 Deficiency in Hindi

विटामिन बी 12 की कमी से होने वाले रोग - Disease caused by Vitamin B12 Deficiency in Hindi

विटामिन बी12 की कमी से कौन से रोग हो सकते हैं?


विटामिन बी12 की कमी से होने वाली ज़्यादातर परेशानियों का आसानी और प्रभावी तरीके से इलाज किया जा सकता है इसलिए बीमारी विरले ही पैदा होती है। 


एनीमिया से जुड़े रोग


वजह जो भी हो, हर तरह के एनीमिया के कारण ह्रदय और फेफड़ों से जुड़ी दिक्कत हो सकती है क्योंकि इन्हें शरीर के महत्वपूर्ण अंगों तक ऑक्सीजन पहुँचाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। 


गंभीर एनीमिया से पीड़ित वयस्कों को निम्न परेशानियाँ हो सकती हैं:

दिल की धड़कन असामान्य रूप से तेज होना

हार्ट फेल होना – जिसमें ह्रदय पूरे शरीर में सही दबाव के साथ पर्याप्त खून की आपूर्ति नहीं कर पाता।

 

स्नायविक परिवर्तन –

विटामिन बी12 की कमी से तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करने वाली दिक्कतें पैदा हो जाती हैं, जैसे;

नजर कमजोर होना या इससे जुड़ी परेशानी

याददाश्त में कमी (और पढ़ें - याददाश्त बढ़ाने के उपाय)

हाथों और पैरों में सुई चुभन का अनुभव

शारीरिक समन्वय में कमी, जिसका प्रभाव आपके पूरे शरीर पर पड़ता है और बोलने या चलने में मुश्किल होती है

तंत्रिका तंत्र के कुछ हिस्से का क्षतिग्रस्त होना, खासकर पैर के हिस्से का प्रभावित होना।

यदि तंत्रिका तंत्र संबंधी कोई परेशानी पैदा हो जाती है तो यह लाइलाज हो सकती है।

 

बांझपन –

विटामिन बी12 की कमी से कई बार अस्थायी रूप से गर्भ धारण करने में असमर्थता हो सकती है। यह समस्या आमतौर पर विटामिन बी12 की कमी के उचित उपचार से ठीक हो जाती है। (और पढ़ें - प्रेग्नेंट होने का तरीका)

 

पेट का कैंसर –

यदि परनीशियस एनीमिया के कारण आपके शरीर में विटामिन बी12 की कमी हुई है (जिसमें आपका प्रतिरक्षा तंत्र अमाशय-पेट की स्वस्थ कोशिकाओं को प्रभावित करता है) तो पेट का कैंसर होने का जोखिम बढ़ जाता है। (और पढ़ें - कैंसर से मुकाबला करने वाले आहार)

 

पैदायशी रोग –

यदि आप गर्भवती हैं और आपके शरीर में विटामिन बी12 की मात्रा पर्याप्त नहीं है तो यह आपके बच्चे में मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी से जुड़ा कोई गंभीर रोग जन्म से हो सकता है।

(और पढ़ें - गर्भावस्था में क्या खाएं)


विटामिन बी 12 की कमी में परहेज़ - What to avoid during Vitamin B12 Deficiency in Hindi?

विटामिन बी 12 की कमी में क्या खाना चाहिए? - What to eat during Vitamin B12 Deficiency in Hindi?

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लैक्टोज इनटॉलेरेंस

लैक्टोज इनटॉलेरेंस (असहिष्णुता) होना क्या है?


लैक्टोज इनटॉलेरेंस या लैक्टोज असहिष्णुता एक आम पाचन संबंधी विकार है, जिसमें शरीर लैक्टोज को पचा नहीं पाता है। लैक्टोज एक प्रकार का शुगर होता है, जो दूध और अन्य डेयरी उत्पादों में पाया जाता है। लैक्टोज असहिष्णुता से ग्रस्त लोगों को डेयरी उत्पाद खाने या पीने के बाद दस्त, गैस या पेट फूलने की समस्या होने लगती है। ये स्थिति छोटी आंत में मौजूद लैक्टोस नामक एंजाइम की कमी के कारण उत्पन्न होती है। कई लोगों में इस एंजाइम का स्तर कम होता है, लेकिन वे दूध और उससे बने उत्पाद आसानी से पचा लेते हैं।


(और पढ़ें - पेट फूल जाए तो क्या करें)


लैक्टोज असहिष्णुता के लक्षण क्या हैं?


लैक्टोज असहिष्णुता होने पर कई लक्षण अनुभव होते हैं। हालांकि, ये लक्षण आपकी समस्या की गंभीरता और डेयरी उत्पाद लेने की मात्रा पर निर्भर करते हैं। इसमें व्यक्ति को पेट खराब, उल्टी, पेट फूलना, दस्त और गैस जैसी समस्याएं होने लगती हैं।


लैक्टोज असहिष्णुता क्यों होती है?


लैक्टोज असहिष्णुता की समस्या तब होती है जब आपकी छोटी आंत लैक्टोज को पचाने वाले एंजाइम को पर्याप्त मात्रा में नहीं बना पाती है। पेट में मौजूद बैक्टीरिया सामान्य तरीके से इस अनवशोषित शुगर पर काम करने लगते हैं, जिसके कारण लैक्टोज असहिष्णुता के लक्षण होते हैं। लैक्टोज असहिष्णुता के तीन प्रकार होते हैं और हर प्रकार की समस्या अलग कारण की वजह से होती है।


(और पढ़ें - बैक्टीरियल संक्रमण का इलाज)


लैक्टोज असहिष्णुता का इलाज कैसे होता है?


लैक्टोज असहिष्णुता का फिलहाल कोई इलाज उपलब्ध नहीं है, लेकिन ऐसे पदार्थ लेना जिनमें लैक्टोस की मात्रा कम है, आपको लक्षणों से कुछ आराम दे सकता है। अगर आप डेयरी उत्पाद लेना चाहते हैं, तो अपने खाने में कम मात्रा में इन्हें ले सकते हैं। आपको कैल्शियम और विटामिन डी के सप्लीमेंट्स की आवश्यकता भी हो सकती है ताकि आपकी हड्डियां मजबूत और स्वस्थ रहें। इसके अलावा ऐसी ड्रॉप्स या गोलियां भी आती हैं जो खाने में मिलाकर खाने से लैक्टोज का पाचन बेहतर होता है, आप चाहें तो ये दवाएं भी ले सकते हैं।


(और पढ़ें - हड्डियां मजबूत करने के घरेलू उपाय)


लैक्टोज इनटॉलेरेंस क्या है - What is Lactose Intolerance in Hindi

लैक्टोज इनटॉलेरेंस क्या है?


लैक्टोज असहिष्णुता स्वास्थ्य संबंधी एक ऐसी स्थिति है, जिसमे मरीज लैक्टोज के पदार्थों को पचा नहीं पाता है। लैक्टोज एक प्रकार का शुगर होता है जो दूध व दूध के उत्पादों में पाया जाता है।


(और पढ़ें -  पाचन तंत्र क्या है)


लैक्टोज असहिष्णुता के चरण - Stages of Lactose Intolerance in Hindi

लैक्टोज असहिष्णुता के लक्षण - Lactose Intolerance Symptoms in Hindi

लैक्टोज से क्या लक्षण होते हैं?


लैक्टोज के निम्नलिखित लक्षण हो सकते हैं:


पेट में सूजन (पेट फूलना)

पेट मे अधिक हवा भर जाना

दस्त लगना

गैस बनना

जी मिचलाना

पेट दर्द होना

पेट में से आवाज आना (जैसे गड़गड़ाहट जैसी आवाज महसूस होना)

उल्टी आना

इससे होने वाले लक्षण हल्के या गंभीर भी हो सकते हैं, जो इस बात पर निर्भर करते हैं कि आपके शरीर में लैक्टोज की कितनी मात्रा है।


डॉक्टर को कब दिखाना चाहिए?


यदि दूध या उससे बना कोई भी उत्पाद खाने के 30 मिनट से 2 घंटे के बाद ऊपर बताए गए लक्षणों में से कोई भी लक्षण महसूस होता है, तो आपको डॉक्टर से दिखा लेना चाहिए। डॉक्टर के पास जाकर आपको इस बारे में अच्छे से बता देना चाहिए।


(और पढ़ें - उल्टी रोकने के घरेलू उपाय)


लैक्टोज इनटॉलेरेंस के कारण व जोखिम कारक - Lactose Intolerance Causes & Risk Factors in Hindi

लैक्टोज इनटॉलेरेंस क्यों होता है?


लैक्टोज असहिष्णुता होने के कारण उसके प्रकार के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं:


लैक्टेज (Lactase, लेक्टेस) एक एंजाइम (एक प्रोटीन जिसके कारण केमिकल रिएक्शन होता है) है। यह छोटी आंत में बनता है तथा इस एंजाइम का उपयोग लैक्टोज को पचाने के लिए किया जाता है। शरीर द्वारा पर्याप्त मात्रा में लैक्टेज ना बना पाने के परिणामस्वरूप ही लैक्टोज असहिष्णुता की समस्या होती है।


यदि आपके शरीर में लैक्टेज की कमी है, इसका मतलब यह है कि आपका शरीर पर्याप्त मात्रा मैं लैक्टेज नहीं बना पा रहा है। 


प्राथमिक लैक्टेज की कमी:


प्राइमरी लैक्टेज डेफिशियेंसी दुनियाभर में लैक्टोज इनटॉलेरेंस का सबसे मुख्य कारण होता है। लैक्टेज की कमी का यह प्रकार आमतौर पर आनुवंशिक होता है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है। 

प्राथमिक लैक्टेज की कमी तब होती है, जब शरीर लैक्टेज बनाने की मात्रा को कम कर देता है। जब आप दूध व अन्य डेयरी उत्पाद खाना कम करते हैं, तो इसके कारण धीरे-धीरे शरीर लैक्टेज बनाने की मात्रा कम कर देता है।

यह आमतौर पर 2 साल की उम्र के बाद होता है, जब बच्चे को स्तनपान करवाना या बोतल से दूध पिलाना बंद कर दिया जाता है। हालांकि ज्यादातर मामलों में वयस्क होने के बाद ही इसके लक्षण दिखाई देते हैं। (और पढ़ें - स्तनपान से जुड़ी समस्याएं)

द्वितीय लैक्टेज की कमी:


छोटी आंत में किसी प्रकार की समस्या होने के कारण जब शरीर में लैक्टेज की कमी हो जाती है, तो स्थिति को सेकेंड्री लैक्टेज डेफिशियेंसी कहा जाता है।

यह किसी भी उम्र में हो सकता है और यह अन्य कई स्थितियों के कारण भी होता है, जैसे छोटी आंत की सर्जरी करना या कुछ निश्चित प्रकार की दवाएं लेना।

द्वितीय लैक्टेज की कमी होना खासकर शिशुओं व बच्चों में लैक्टोज इनटॉलेरेंस होने का सबसे आम कारण होता है। 

लैक्टोज इनटॉलेरेंस होने का खतरा कब बढ़ता है?


जिन लोगों को निम्नलिखित समस्याएं हैं, उनको लैक्टोज इनटॉलेरेंस होने के अधिक जोखिम रहते हैं:


पेट में इन्फेक्शन:

इस स्थिति को गैस्ट्रोएंटेराइटिस भी कहा जाता है, इसमे पेट व आंतों में इन्फेक्शन हो जाता है। (और पढ़ें - पेट में इन्फेक्शन के लक्षण)

 

एंटीबायोटिक:

लंबे समय तक एंटीबायोटिक दवाएं लेने से भी लैक्टोज इनटॉलेरेंस हो सकता है।

 

क्रोन रोग:

यह लंबे समय तक रहने वाली एक समस्या है, जिसमें पाचन तंत्र की अंदरुनी परत में लालिमा व सूजन आ जाती है। (और पढ़ें - क्रोन रोग का इलाज)

 

अल्सरेटिव कोलाइटिस:

यह भी एक दीर्घकालिक स्थिति होती है, जो बड़ी आंत को प्रभावित करती है। (और पढ़ें - अल्सरेटिव कोलाइटिस के कारण)

 

कीमोथेरेपी:

यह एक उपचार प्रक्रिया है, जिसका इस्तेमाल कैंसर का इलाज करने के लिए किया जाता है।

 

सीलिएक रोग:

यह आंत संबंधी समस्या है, जो ग्लूटेन नामक एक प्रोटीन की विपरित प्रक्रिया के कारण होती है। (और पढ़ें - सीलिएक रोग का इलाज)

शरीर में कम मात्रा में लैक्टेज बनना लैक्टेज की कमी का द्वितीय प्रकार है, जो ज्यादातर मामलों में कुछ ही समय के लिए होता है। लेकिन जिन मामलों में यह स्थायी रूप से हो जाता है, तो ऐसी स्थितियों में इससे कई दीर्घकालिक प्रभाव पड़ते रहते हैं। 


सेकेंड्री लैक्टेज डेफिशियेंसी उम्र बढ़ने के साथ-साथ फिर से भी हो सकती है, यहां तक यह बिना किसी अन्य स्थिति के कारण भी हो जाती है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ-साथ आपके शरीर की लैक्टेज बनाने की क्षमता भी कम हो जाती है। 


कॉन्जेनिटल लैक्टेज डेफिशियेंसी एक ऐसी स्थिति है, जिसमें जन्म से ही शिशु की छोटी आंत बहुत ही कम मात्रा में लैक्टेज बनाती है या बिलकुल ही नहीं बना पाती है।


(और पढ़ें - प्रोटीन की कमी से होने वाले रोग)


लैक्टोज असहिष्णुता के बचाव - Prevention of Lactose Intolerance in Hindi

लैक्टोज असहिष्णुता की रोकथाम कैसे करें?


कुछ उपाय हैं, जिनकी मदद से लैक्टोज इनटॉलेरेंस से बचने के उपाय मिल सकते हैं:


डेयरी उत्पादों को अन्य खाद्य पदार्थों के साथ खाएं, ऐसा करने से लैक्टोज इनटॉलेरेंस के लक्षण ज्यादा नहीं हो पाते हैं।

ऐसे डेरी उत्पादों को अपनाएं जिनमें लैक्टोज ना हो या कम मात्रा में हो। ऐसे काफी पदार्थ उपलब्ध हैं। इन पदार्थों में दूध, प्रोसेस्ड बटर, दही, हार्ड चीज व अन्य शामिल हैं।

एक समय के आहार में थोड़ी सी मात्रा में दूध या उससे बना कोई उत्पाद शामिल करें और देखें कि आपको कोई लक्षण महसूस होता है या नहीं। 

आप दही खा सकते हैं, जिसमें वसा ना हो। दही में अच्छे सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं, जिनके कारण लैक्टोज इनटॉलेरेंस जैसे कोई लक्षण नहीं होते।

एक समय के भोजन में ऐसे पदार्थों को ना खाएं जिनमें अधिक मात्रा में लैक्टोज पाया जाता है, जैसे बिना वसा वाला दूध, मक्खन या आइसक्रीम आदि।

यदि आप डेयरी उत्पाद लेते हैं, तो उनके लेने के समय में कुछ बदलाव करें। इन पदार्थों को अकेले खाने की बजाए भोजन के साथ इनका सेवन करें। 

दूध व उसके उत्पादों को खाने की बजाए फलों के रस पिएं। 

लैक्टोज असहिष्णुता से बचने के लिए डेयरी प्रोडक्ट्स खाने के साथ-साथ लैक्टेज एंजाइम टेबलेट लें। 

लैक्टोज वाले खाद्य पदार्थों से बचने के लिए आपको कोई भी खाद्य पदार्थ खाने से पहले उसके डिब्बे पर लगी पर्ची को पढ़ लेना चाहिए। इस पर्ची पर उस खाद्य पदार्थ में डाली गई सामग्री की लिस्ट होती है, यदि किसी खाद्य पदार्थ में लैक्टोज है तो उसे ना खाएं। यदि सामग्री की लिस्ट में निम्नलिखित में से कोई भी शब्द लिखा है, तो इसका मतलब उस खाद्य पदार्थ में लैक्टोज है:


दूध (Milk)

लैक्टोज (Lactose)

दूध के प्रोडक्ट्स (Milk by-products)

बिना वसा वाला दूध का पाउडर (Non-fat dry milk powder)

व्हे (Whey)

ड्राई मिल्क सोलिड्स (Dry milk solids)

(और पढ़ें - गर्म दूध पीने के फायदे)


लैक्टोज असहिष्णुता का परीक्षण - Diagnosis of Lactose Intolerance in Hindi

लैक्टोज इनटॉलेरेंस का परीक्षण कैसे किया जाता है?


परीक्षण के दौरान डॉक्टर आपके लक्षणों के बार में पूछ सकते हैं। लैक्टोज असहिष्णुता का परीक्षण कई तरीकों से किया जा सकता है, जिनमें निम्नलिखित तरीके शामिल हो सकते हैं:


हाइड्रोजन ब्रिथ टेस्ट:

इसकी मदद से सांस छोड़ने के दौरान हाइड्रोजन की मात्रा को मापा जाता है। उसके बाद डॉक्टर नियमित रूप से समय-समय पर आपकी सांस में हाइड्रोजन की मात्रा को मापते हैं। छोड़ी गई सांस में सामान्य तौर पर थोड़ी सी मात्रा में हाइड्रोजन मिलती है। हालांकि यदि आपका शरीर लैक्टोज को पचा ना पाए, तो बड़ी आंत में उसका खमीर उठने (Ferment) लगता है और हाइड्रोजन व अन्य गैसें बनने लग जाती हैं। अंत में ये गैसें आंतों से अवशोषित कर ली जाती हैं और सांस द्वारा बाहर निकाल दी जाती है। यदि ब्रिथ टेस्ट के दौरान सामान्य से अधिक मात्रा में हाइड्रोजन गैस पाई जाती है, तो इसका मतलब है कि आप लैक्टोज का पाचन व अवशोषण ठीक तरीके से नहीं कर पा रहे हैं। (और पढ़ें - सांस लेने में दिक्कत के लक्षण)

 

एलीमिनेशन डाइट:

इस प्रक्रिया में उन खाद्य पदार्थों का सेवन बंद कर दिया जाता है, जिनमें लैक्टोज होता है और फिर यह देखा जाता है कि लक्षणों में सुधार होता है या नहीं। यदि इन खाद्य पदार्थों को खाना फिर से शुरू करने के बाद लक्षण दोबारा आने लग जाते हैं, तो इसका कारण लैक्टोज इनटॉलेरेंस हो सकता है।

 

स्टूल एसिडिटी टेस्ट:

शिशु व छोटे बच्चे जिनके अन्य टेस्ट नहीं किए जा सकते उनके लिए स्टूल एसिडिटी टेस्ट किया जा सकता है। बिना पची हुई लैक्टोज में खमीर उठने से लैक्टिक एसिड व अन्य प्रकार के एसिड बनने लग जाते हैं। स्टूल एसिडिटी टेस्ट की मदद से सभी प्रकार के एसिड का पता लगा लिया जाता है। (और पढ़ें - स्टूल टेस्ट क्या है)

 

लैक्टोज टॉलेरेंस टेस्ट:

यह टेस्ट लैक्टोज में उच्च एक विशेष पेय पदार्थ के प्रति आपके शरीर की प्रतिक्रिया को दर्शाता है। लैक्टोज से उच्च तरल पदार्थ पीने के 2 घंटे बाद आपका खून टेस्ट किया जाता है जिसमें खून में ग्लूकोज के स्तर की जांच की जाती है। यदि आपके ग्लूकोज का स्तर नहीं बढ़ा है, तो इसका मतलब आपका शरीर लैक्टोज युक्त तरल पदार्थ को ठीक से पचा नहीं पाया है।

(और पढ़ें - लैब टेस्ट क्या है)


लैक्टोज इनटॉलेरेंस का इलाज - Lactose Intolerance Treatment in Hindi

लैक्टोज इनटॉलेरेंस का इलाज कैसे किया जाता है?


यदि आप डेयरी उत्पादों को छोड़ना नहीं चाहते, तो कुछ प्राकृतिक उपचार हैं जो आपके लिए सहायक हो सकते हैं:


एंजाइम सप्लीमेंट्स -


लैक्टोज को पचाने के लिए एंजाइम के सप्लीमेंट्स लिए जा सकते हैं। एंजाइम सप्लीमेंट्स को आप टेबलेट के रूप में भी ले सकते हैं और ये द्रव में भी आते हैं जिनको भोजन में मिलाकर खाया जा सकता है।

हालांकि इन सप्लीमेंट्स का प्रभाव हर व्यक्ति के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। 

लैक्टेज सप्लीमेंट्स के एंजाइम कुछ लोगों के लिए काफी प्रभावी हो सकते हैं। 

लैक्टोज के संपर्क में आना:


यदि आपको लैक्टोज इनटॉलेरेंस है, तो नियमित रूप से लैक्टोज वाले खाद्य पदार्थों को अपने आहार में शामिल करने से आपके शरीर को इसकी आदत पड़ सकती है। 

डॉक्टर पहले मरीज का लैक्टोज के संपर्क में आने का कठिन परीक्षण करते है और फिर उसके बाद अपना निश्चित सुझाव देते हैं। आंतों को लैक्टोज सहन करना सीखाना संभव हो सकता है।

प्रोबायोटिक्स और प्रीबायोटिक्स:


प्रोबायोटिक्स सूक्ष्मजीव होते हैं, जो शरीर के लिए काफी स्वास्थ्यवर्धक होते हैं। 

प्रीबायोटिक्स एक प्रकार का फाइबर होता है, जो इन अच्छे बैक्टीरिया के लिए भोजन का काम करता है। आपकी आंतों में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया प्रीबायोटिक्स को खाकर जिंदा रहते हैं। 

प्रीबायोटिक्स और प्रोबायोटिक्स दोनों लैक्टोज इनटॉलेरेंस के लक्षणों को कम करने में मदद करते हैं। 

कुछ प्रकार के प्रीबायोटिक्स और प्रोबायोटिक्स लक्षणों को कम करने में अन्य प्रकारों से अधिक प्रभावी हो सकते हैं। 

बिफिडोबैक्टीरिया नाम के एक बैक्टीरिया को सबसे अधिक स्वास्थ्यवर्धक सूक्ष्मजीवों में से एक माना जाता है, यह अक्सर प्रोबायोटिक दही व अन्य सप्लीमेंट्स में पाया जाता है। 

डेयरी पदार्थों की जगह से उच्च कैल्शियम वाले खाद्य पदार्थों को खाएं:


डेयरी पदार्थों को कम करने का मतलब ये नहीं है कि आप पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम नहीं प्राप्त कर पाएंगे। कुछ ऐसे खाद्य पदार्थ भी शामिल हैं, जिनमें पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है, जैसे:


ब्रोकोली

कुछ ऐसे खाद्य पदार्थ जिनमें कृत्रिम रूप से कैल्शियम शामिल किया जाता है, जैसे ब्रैड व फलों के रस आदि

मछली

दूध के वैकल्पिक पदार्थ जैसे सोया दूध व राइस मिल्क (चावल का दूध)

संतरा

पालक

(और पढ़ें - सब्जियां खाने के फायदे)


लैक्टोज इनटॉलेरेंस की जटिलताएं - Lactose Intolerance Complications in Hindi

लैक्टोज इनटॉलेरेंस से क्या समस्याएं होती है?


यदि आप लैक्टोज इनटॉलेरेंस के कारण पर्याप्त मात्रा में पोषक (जैसे कैल्शियम और विटामिन डी) तत्व प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं, तो इससे आपके स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ने लगता है। दूध व उससे बने अन्य उत्पादों जिनमें लैक्टोज होता है, ये पदार्थ कैल्शियम, विटामिन डी और अन्य कई पोषक तत्वों के मुख्य स्रोत होते हैं। 


हड्डियों को स्वस्थ रखने के लिए आपको जीवनभर कैल्शियम की आवश्यकता पड़ती है। यदि आप पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं तो आपकी हड्डियों कमजोर हो जाती हैं और उनके टूटने का खतरा बढ़ जाता है। इस स्थित को ओस्टियोपोरोसिस कहा जाता है। 


यदि आपको लैक्टोज असहिष्णुता है, तो आप अपने आहार में कुछ बदलाव करके पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम प्राप्त कर सकते हैं और अपने लक्षणों को भी शांत कर सकते हैं। 


(और पढ़ें - हड्डी मजबूत करने के घरेलू उपाय)


लैक्टोज असहिष्णुता में परहेज़ - What to avoid during Lactose Intolerance in Hindi?

लैक्टोज असहिष्णुता में क्या खाना चाहिए? - What to eat during Lactose Intolerance in Hindi?

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मेटाबोलिक सिंड्रोम

मेटाबॉलिक सिंड्रोम समस्याओं का एक झुंड होता है, मुख्य रूप से इसमें ब्लड प्रेशर बढ़ना, ब्लड शुगर बढ़ जाना, कमर के आस-पास चर्बी बढ़ जाना और कोलेस्ट्रॉल व ट्राइग्लिसराइड का स्तर असामान्य होना जाने जैसी समस्याएं शामिल होती हैं। मेटाबॉलिक सिंड्रोम में ये समस्याएं एक साथ होती हैं जिससे स्ट्रोक, डायबिटीज व हृदय संबंधी समस्याएं होने के जोखिम बढ़ जाते हैं। 


(और पढ़ें - कोलेस्ट्रॉल के लक्षण)


यदि आपको इन समस्याओं में से कोई एक है तो इसका मतलब ये नहीं है कि आपको मेटाबॉलिक सिंड्रोम है। हालांकि इनमें से कोई भी एक समस्या किसी गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ा देती है। यदि इन समस्याओं में से एक से अधिक समस्याएं एक साथ हो गई है तो आपके जोखिम और अधिक बढ़ जाते हैं।


(और पढ़ें - ह्रदय रोग का इलाज)


यदि आपको मेटाबॉलिक सिंड्रोम या इससे होने वाली समस्याएं हैं तो इसकी रोकथाम करने के लिए जीवनशैली में कुछ बदलाव करने चाहिए। क्योंकि मेटाबॉलिक सिंड्रोम होने पर अगर जीवनशैली में तुरंत कुछ बदलाव कर लिए जाएं तो इससे होने वाली गंभीर समस्याओं को कुछ समय के लिए या स्थायी रूप से रोका जा सकता है। 


मेटाबोलिक सिंड्रोम के प्रकार - Types of Metabolic Syndrome in Hindi

मेटाबोलिक सिंड्रोम के चरण - Stages of Metabolic Syndrome in Hindi

मेटाबोलिक सिंड्रोम के लक्षण - Metabolic Syndrome Symptoms in Hindi

मेटाबोलिक सिंड्रोम के लक्षण - Metabolic Syndrome Symptoms in Hindi

मेटाबॉलिक सिंड्रोम से कौन से लक्षण हो सकते हैं?


मेटाबॉलिक सिंड्रोम से जुड़े ज्यादातर विकारों में किसी प्रकार के लक्षण पैदा नहीं होते। हालांकि कमर के आस-पास की चर्बी बढ़ना इसका एक संकेत हो सकता है। यदि आपका ब्लड शुगर अधिक बढ़ गया है तो आप में डायबिटीज के लक्षण विकसित होने लग सकते हैं जैसे अधिक प्यास लगना, अधिक पेशाब आना, थकान व धुंधला दिखाई देना आदि।


(और पढ़ें - कमर पतली करने के उपाय)


डॉक्टर को कब दिखाना चाहिए?


यदि आपको मेटाबॉलिक सिंड्रोम से जुड़ी कोई भी समस्या महसूस हो रही है तो आपको जल्द से जल्द डॉक्टर के पास जाना चाहिए। डॉक्टर के पास जाकर आपको इस बारे में भी जानकारी लेनी चाहिए कि आपको मेटाबॉलिक सिंड्रोम व उससे होने वाली समस्याओं के लिए टेस्ट करवाने की आवश्यकता है या नहीं।


मेटाबोलिक सिंड्रोम के कारण - Metabolic Syndrome Causes & Risk Factor in Hindi

मेटाबोलिक सिंड्रोम के कारण - Metabolic Syndrome Causes & Risk Factor in Hindi

मेटाबॉलिक सिंड्रोम क्यों होता है?


मेटाबॉलिक सिंड्रोम अधिक वजन बढ़ने, मोटापे और निष्क्रियता (शरीर गतिशील ना होना) जैसी स्थितियों से काफी बारीकी से जुड़ा होता है। 


यह इन्सुलिन रेजिस्टेंस (इन्सुलिन प्रतिरोध) नामक स्थिति से भी जुड़ा होता है। आमतौर पर आपकी पाचन प्रणाली आपके खाए गए भोजन को शुगर (ग्लूकोज) में परिवर्तित कर देती है। इन्सुलिन आपके अग्न्याशय द्वारा बनाया जाने वाला एक हार्मोन होता है जो शुगर को कोशिकाओं के अंदर प्रवेश में मदद करता है। कोशिकाएं शुगर को ईंधन के रूप में उपयोग करती हैं।


जिन लोगों को इन्सुलिन रेजिस्टेंस होता है, उनकी कोशिकाएं इन्सुलिन पर सामान्य रूप से प्रतिक्रिया नहीं देती जिससे शुगर कोशिकाओं के अंदर आसानी से प्रवेश नहीं कर पाता। इसके परिणामस्वरूप पीड़ित के खून में लगातार ग्लूकोज (शुगर) का स्तर लगातार बढ़ता रहता है, हालांकि शरीर लगातार अधिक से अधिक इन्सुलिन सोंख कर खून में मौजूद शुगर के लेवल को कम करने की कोशिश करता है।


(और पढ़ें - इन्सुलिन क्या होता है)


मेटाबॉलिक सिंड्रोम होने का जोखिम कब बढ़ जाता है?  


कुछ ऐसे कारक जो मेटाबॉलिक सिंड्रोम होने के जोखिम का बढ़ाते हैं, जैसे


उम्र: 

उम्र के साथ-साथ मेटाबॉलिक सिंड्रोम होने के जोखिम भी बढ़ जाते हैं।

 

मोटापा: 

शरीर का अत्यधिक वजन होना भी मेटाबॉलिक सिंड्रोम के जोखिम को बढ़ाता है, खासकर यदि पेट की चर्बी या वजन अधिक है तो मेटाबॉलिक सिंड्रोम विकसित होने के जोखिम और अधिक बढ़ जाते हैं। (और पढ़ें - मोटापा कम करने के उपाय)

 

डायबिटीज: 

यदि आपको गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज (Gestational diabetes) था तो आप में मेटाबॉलिक सिंड्रोम विकसित होने के जोखिम बढ़ सकते हैं। अगर टाइप 2 डायबिटीज आपकी पारिवारिक समस्या (परिवार में एक से अधिक लोगों को होना) है तो भी आप में मेटाबॉलिक सिंड्रोम विकसित होने के जोखिम बढ़ सकते हैं। (और पढ़ें - डायबिटीज में परहेज)

 

अन्य रोग: 

यदि आपको वर्तमान में या फिर पहले कभी नॉन अल्कोहलिक फैटी लीवर, पॉलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम या हृदय संबंधी रोग हुए हैं तो आप में मेटाबॉलिक सिंड्रोम होने के जोखिम बढ़ सकते हैं। 

मेटाबोलिक सिंड्रोम के बचाव के उपाय - Prevention of Metabolic Syndrome in Hindi

मेटाबोलिक सिंड्रोम का परीक्षण - Diagnosis of Metabolic Syndrome in Hindi

मेटाबोलिक सिंड्रोम का परीक्षण - Diagnosis of Metabolic Syndrome in Hindi

मेटाबॉलिक सिंड्रोम का परीक्षण कैसे किया जाता है?


कुछ संस्थाओं में मेटाबॉलिक सिंड्रोम का परीक्षण करने के मानदंड होते हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ) के दिशा निर्देशों के अनुसार यदि आपको निम्न में से तीन या उससे ज्यादा लक्षण महसूस हो रहे हैं या आप उनको कंट्रोल करने की दवाएं ले रहे है तो आपको मेटाबॉलिक सिंड्रोम हो सकता है। 


कमर की परिधि अधिक होना:

महिलाओं में सामान्य कमर का साइज 35 इंच (89 सेंटीमीटर) और पुरूषों में 40 इंच (102 सेंटीमीटर) माना जाता है। 

 

ट्राइग्लिसराइड का स्तर अधिक होना: 

यह एक प्रकार की वसा होती है जो खून में 150 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर (mg/dL) या 1.7 मिलीमोल्स प्रति लीटर (mmol/L) या फिर इससे अधिक मात्रा में पाई जाती है।

 

हाई डेनसिटी लेपोप्रोटीन (HDL) कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होना: 

पुरुषों में 40 मिलीग्राम / डीएल (1.04 mmol/L) से कम और महिलाओं में 50 मिलीग्राम / डीएल (1.3 mmol/L) से कम एचडीएल की मात्रा कोलेस्ट्रॉल के लिए सही होती है। (और पढ़ें - कोलेस्ट्रॉल कम करने के उपाय)

 

ब्लड प्रेशर बढ़ना: 

ब्लड प्रेशर का स्तर 130/85 मिलीमीटर या उससे अधिक होना। (और पढ़ें - बीपी कम करने के उपाय)

 

फास्टिंग ब्लड शुगर का स्तर बढ़ना: 

100 मिलीग्राम / डीएल (5.6 mmol/L) या उससे अधिक होना। (और पढ़ें - एचबीए1सी टेस्ट क्या है)

मेटाबोलिक सिंड्रोम का इलाज - Metabolic Syndrome Treatment in Hindi

मेटाबोलिक सिंड्रोम का इलाज - Metabolic Syndrome Treatment in Hindi

मेटाबॉलिक सिंड्रोम का इलाज कैसे किया जाता है?


मेटाबॉलिक सिंड्रोम जोखिम कारकों का एक समूह है जिसमें हाई ब्लड प्रेशर, हाई ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल का स्तर असामान्य होना शामिल है। मेटाबॉलिक सिंड्रोम के उपचार मुख्य रूप से इस सिंड्रोम से होने वाली समस्याओं से निपटने पर केंद्रित होता है। उपचार का मुख्य लक्ष्य धमनियों की बीमारी, हृदय के रोग और डायबिटीज का इलाज करना होता है। 


ज्यादातर मामलों में मेटाबॉलिक सिंड्रोम का इलाज आपके साथ ही होता है। इस स्थिति का इलाज करने के लिए डॉक्टर आपको आदतों में सुधार करने के लिए कहते हैं जैसे स्वस्थ भोजन करना और अधिक एक्सरसाइज करना आदि। कुछ अच्छी आदतों को अपनाने से आप अपने जोखिम कारकों को पूरी तरह से हटाने में सक्षम हो सकते हैं। 


जीवनशैली में ये बदलाव करें - 


अधिक एक्सरसाइज करना: 

वजन घटाने के लिए एक्सरसाइज करना सबसे बेहतर तरीका है, लेकिन यदि आपको वजन कम होता महसूस नहीं हो रहा तो एक्सरसाइज बीच में नहीं छोड़नी चाहिए। यदि एक्सरसाइज से एक किलो वजन भी कम नहीं हुआ है तो भी एक्सरसाइज करते रहना चाहिए। क्योंकि एक्सरसाइज करने से ब्लड प्रेशर कम होता है, कोलेस्ट्रॉल के स्तर में सुधार होता है और इन्सुलिन रेजिस्टेंस की स्थिति में भी सुधार होता है। (और पढ़ें - वजन कम करने के एक्सरसाइज)


यदि आपके शरीर का आकार अधिक बढ़ा हुआ है तो आपको धीरे -धीरे एक्सरसाइज धीरे-धीरे शुरू करना चाहिए। अधिक चलने की कोशिश करें। दिन में अधिक से अधिक शारीरिक गतिविधियां करने की कोशिश करें। यदि आप पैदल कहीं जा रहे हैं तो छोटे रास्ते से जाने की जगह लंबे रास्ते से जाने की कोशिश करें ताकि आप थोड़ा अधिक चल सकें। (और पढ़ें - पेट कम करने के लिए एक्सरसाइज)


जब तक आप किसी शारीरिक गतिविधि को सप्ताह में कई बार नहीं करने लग जाते तब तक उस गतिविधि को दिन में कई बार करें। लेकिन बहुत महत्वाकांक्षी भी ना बनें। यदि आप किसी ऐसी एक्सरसाइज को करने का प्रयास कर रहे हैं तो कि बहुत कठिन है तो आप इससे हार मान सकते हैं। आपको अपने लिए एक्सरसाइज का ऐसा स्तर निर्धारित करना होगा जो आपके शरीर के लिए फिट बैठता हो। (और पढ़ें - कमर करने के लिए एक्सरसाइज)

 

स्वस्थ आहार खाएं: 

स्वस्थ आहार आपके कोलेस्ट्रॉल, इन्सुलिन रेजिस्टेंस और ब्लड प्रेशर में सुधार कर सकता है, चाहे आपका वजन ज्यों का त्यों बना रहे। स्वस्थ आहार संबंधी सलाह के लिए डॉक्टर से या किसी अच्छे डाइटीशियन से बात करें। यदि आपको हृदय संबंधी रोग या डायबिटीज है तो आपको किसी विशेष आहार प्लान की आवश्यकता पड़ सकती है। (और पढ़ें - संतुलित आहार चार्ट)


सामान्य तौर पर जिस आहार में सेचुरेटेड फैट, अनसेचुरेटेड फैट, कोलेस्ट्रॉल और नमक की मात्रा कम पाई जाती है और सब्जियां, फल, लीन प्रोटीन, बीन्स, कम वसा वाले डेयरी उत्पाद और साबुत अनाज खूब मात्रा में पाए जाते हैं वे इस स्थिति के लिए स्वस्थ आहार माने जाते हैं। इन खाद्य पदार्थों हृदय संबंधी रोगों से ग्रस्त लोगों के लिए काफी मददगार माना गया है। (और पढ़ें - वजन घटाने के लिए क्या खाएं)


इसके अलावा डॉक्टर ऐसा भोजन करने की सलाह देते हैं जिनमें अच्छी वसा (जैसे जैतून के तेल में पाया जाने वाला मोनोअनसेचुरेटेड फैट) और कार्बोहाइड्रेट्स व प्रोटीन पर्याप्त मात्रा में मौजूद हो। (और पढ़ें - weight loss diet chart in hindi)

 

थोड़ा बहुत वजन घटाना: 

जाहिर तौर पर वजन घटाने के लिए अक्सर एक्सरसाइज करना और स्वस्थ भोजन करना इन दोनों प्रक्रियाओं की एक साथ जरूरत पड़ती है। लेकिन यदि आपका वजन अधिक है या आप अधिक मोटे हैं तो यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण लक्ष्य हो सकता है। वजन घटाना मेटाबॉलिक सिंड्रोम के हर पहलू में मदद कर सकता है। (और पढ़ें - मोटापा कम करने के लिए डाइट चार्ट)

 

यदि आप धूम्रपान करते हैं तो इसे छोड़ दें: 

धूम्रपान को मेटाबॉलिक सिंड्रोम विकसित करने वाला जोखिम तो नहीं माना जाता, फिर भी अत्यधिक धूम्रपान करना आपकी हृदय व धमनियों के रोग विकसित होने के जोखिम को बढ़ा सकता है। 

(और पढ़ें - सिगरेट पीने के नुकसान)


मेटाबोलिक सिंड्रोम की जटिलताएं - Metabolic Syndrome Complications in Hindi

मेटाबोलिक सिंड्रोम की जटिलताएं - Metabolic Syndrome Complications in Hindi

मेटाबॉलिक सिंड्रोम से कौन-कौन सी समस्याएं पैदा हो सकती हैं?


डायबिटीज: 

यदि आप अपने अधिक बढ़ते वजन को कंट्रोल करने के लिए जीवनशैली में बदलाव नहीं करते तो इससे इन्सुलिन रेजिस्टेंस हो सकता है और आपके ग्लूकोज का स्तर बढ़ता चला जाता है। ऐसी स्थिति में डायबिटीज विकसित होने के जोखिम बढ़ जाते हैं। (और पढ़ें - डायबिटीज डाइट चार्ट)

 

हृदय संबंधी रोग: 

कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने या ब्लड प्रेशर बढ़ने से आपकी धमनियों में प्लाक जमने लग जाता है। यह प्लाक जमने से धमनियों के अंदर की जगह कम होने लगती है और वे कठोर बनने लग जाती हैं, जिस कारण से स्ट्रोक और हार्ट अटैक होने का खतरा बढ़ जाता है। (और पढ़ें - हार्ट अटैक आने पर क्या करें)

मेटाबोलिक सिंड्रोम में परहेज़ - What to avoid during Metabolic Syndrome in Hindi?

मेटाबोलिक सिंड्रोम में क्या खाना चाहिए? - What to eat during Metabolic Syndrome in Hindi?

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बिस्तर गीला करना

बिस्तर गीला करना (बेड वेटिंग) क्या है?


सोते समय अनैच्छिक रूप से मूत्र का निकलना (मूत्र असंयम) को बिस्तर गीला करना (बेड वेटिंग) कहते हैं।


बेड वेटिंग को चिकित्सकीय भाषा में "रात्रिकालीन निरंकुश शैय्या मूत्र" कहा जाता है।


महिलाओं की तुलना में पुरुषों में बिस्तर गीला करने की दोगुनी संभावनाएं होती है।


बेड वेटिंग के दो प्रकार हो सकते हैं –


प्राथमिक एनुरेसिस – बचपन से बिस्तर गीला करना। 


माध्यमिक एनुरेसिस – कम से कम छह महीने लगातार रात में बिना बिस्तर गीला किये बिताने के बाद यह बीमारी उत्पन्न होना। 


बचपन से बिस्तर गीला करना प्राथमिक बेड वेटिंग (Bedwetting) कहलाता है। प्राथमिक बेड वेटिंग तंत्रिका तंत्र (nervous system) के देर से परिपक्व होने की वजह से होता है। यह मूत्राशय द्वारा सोये हुए मस्तिष्क को भेजे गए संदेशों को पहचानने में होने वाली असमर्थता है।


प्राथमिक बेड वेटिंग के लिए इलाज है - बच्चे को थोड़े-थोड़े समय बाद पेशाब कराने ले जाएं।


चिकित्सकीय और व्यावहारिक विकल्पों सहित कई व्यवधान हैं।


कम से कम छह महीनों के लिए रात में सूखा रहने के बाद बिस्तर गीला करना शुरू होना माध्यमिक बेड वेटिंग कहलाता है। यह मूत्र संक्रमण, मधुमेह और अन्य चिकित्सकीय स्थितियों के कारण होता  है।


बच्चे को दिए जाने वाले शौच प्रशिक्षण के दौरान उसके द्वारा बिस्तर गीला करना एक ख़राब लक्षण नहीं है। यह अक्सर बच्चे के विकास का सिर्फ एक सामान्य हिस्सा होता है। सभी प्रकार के बेड वेटिंग का प्रबंधन किया जा सकता है। मार्गदर्शन के लिए हमेशा बच्चे के चिकित्सक से बात करें।


(और पढ़ें - मूत्र असंयमिता का इलाज)


 


बिस्तर गीला करने के प्रकार - Types of Bedwetting in Hindi

बिस्तर गीला करने के प्रकार - Types of Bedwetting in Hindi

बिस्तर गीला करने के प्रकार क्या है?


बिस्तर गीला करने के दो प्रकार हैं –


प्राथमिक - प्राथमिक बेड वेटिंग का अर्थ है कि बचपन से ही बच्चा निरंतर रूप से बिस्तर गीला करता है। प्राथमिक बेड वेटिंग से ग्रस्त एक बच्चा रात में किसी भी अवधि के लिए कभी सूखा नहीं रहता है।

माध्यमिक - माध्यमिक बेड वेटिंग में बच्चा रात में कम से कम 6 महीने की अवधि के लिए बिस्तर गीला नहीं करता है, लेकिन उसके बाद ये समस्या शुरू हो जाती है। 

(और पढ़ें - गर्भावस्था में बार बार पेशाब आने के कारण)


बिस्तर गीला करने के चरण - Stages of Bedwetting in Hindi

बिस्तर गीला करने के लक्षण - Bedwetting Symptoms in Hindi

बिस्तर गीला करने के लक्षण - Bedwetting Symptoms in Hindi

बिस्तर गीला करने के लक्षण क्या हैं?


ज्यादातर लोग जिन्हें बिस्तर गीला करने की बीमारी होती है, वे ऐसा सिर्फ रात में करते हैं। रात में बिस्तर को गीला करने के अलावा उनमें अन्य कोई लक्षण नहीं होते हैं।


अन्य लक्षण मनोवैज्ञानिक कारणों या तंत्रिका तंत्र या गुर्दे से संबंधित समस्याओं की और संकेत कर सकते हैं और परिवार या स्वास्थ्य देखभाल प्रदाता को सचेत करते हैं कि यह लक्षण नियमित बिस्तर गीला करने से अधिक कुछ हो सकता है।


दिन में गीला होना। 

पेशाब का बार-बार अत्यधिक मात्रा में आना या पेशाब करते समय जलन होना। (और पढ़ें - यूरिन इन्फेक्शन के उपाय)

पेशाब करते समय तनाव, पेशाब का टपकना (मूत्र विसर्जन के बाद) या अन्य असामान्य लक्षण होना। 

मटमैला या गुलाबी मूत्र या जांघिया अथवा पाजामे पर खून के दाग। 

सोइलिंग (गंदा करना), मल त्यागने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने में असमर्थ (जिसे मल असंयम या एन्कोपैसिस कहा जाता है) होने के कारण। (और पढ़ें - स्टूल टेस्ट क्या है)

कब्ज

(और पढ़ें - कब्ज दूर करने के उपाय)


बिस्तर गीला करने के कारण - Bedwetting Causes in Hindi

बिस्तर गीला करने के कारण - Bedwetting Causes in Hindi

बिस्तर गीला करने के कारण क्या हैं?


कोई भी यह सुनिश्चित रूप से नहीं जानता कि बिस्तर गीला करना किन कारणों से होता है, लेकिन इसमें विभिन्न कारक भूमिका निभा सकते हैं –


एक छोटा मूत्राशय:

हो सकता है कि आपके बच्चे का मूत्राशय इतना विकसित नहीं हुआ हो, जिसमें रात्रि के दौरान उत्पादित मूत्र समा सके।

 

भरे हुए मूत्राशय को पहचानने में असमर्थता:

यदि मूत्राशय को नियंत्रित करने वाली तंत्रिकाएं (nerves) धीमी गति से परिपक्व होती हैं, तो एक पूर्ण मूत्राशय (full bladder) आपके बच्चे को सचेत नहीं कर पाता है, खासकर अगर आपका बच्चा गहरी नींद में सोता है। (और पढ़ें - ज्यादा नींद आने का इलाज)

 

हार्मोन असंतुलन:

बचपन में कुछ बच्चे रात के समय मूत्र उत्पादन की प्रक्रिया को धीमा करने वाले एंटी- ड्यूरेटिक हार्मोन (एडीएच) का पर्याप्त उत्पादन नहीं करते हैं। (और पढ़ें - हार्मोन असंतुलन का इलाज)

 

तनाव:

तनावपूर्ण घटनाएं, जैसे – बड़ा भाई या बहन बनना, नए स्कूल में जाना शुरू करना या किसी दूसरे और नए घर में सोने के कारण बिस्तर गीला करने की समस्या शुरू हो सकती है। (और पढ़ें - तनाव का इलाज)

 

मूत्र मार्ग संक्रमण:

इस मूत्र मार्ग संक्रमण के चलते आपके बच्चे के लिए पेशाब को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है। (और पढ़ें - यूरिन इन्फेक्शन के उपाय)

 

स्लीप एप्निया:

कभी-कभी बिस्तर गीला करना बाधक निंद्रा अश्वसन (ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया) का लक्षण होता है। यह ऐसी स्थिति है, जिसमें सूजे हुए टॉन्सिल्स या एडेनोइड्स के कारण सोते समय बच्चे की श्वास बाधित होती है। (और पढ़ें - स्लीप एप्निया का इलाज)

 

मधुमेह:

आमतौर पर रात में सूखा रहने वाले एक बच्चे के लिए बिस्तर गीला करना मधुमेह का पहला संकेत हो सकता है। अन्य संकेतों और लक्षणों में - एक ही बार में मूत्र की अत्यधिक मात्रा का निकलना, अधिक प्यास लगना, थकान और उचित मात्रा में भोजन खाने के बावजूद वजन घटना शामिल हो सकते हैं। (और पढ़ें - शुगर का आयुर्वेदिक इलाज)

 

क्रोनिक (दीर्घकालिक) कब्ज:

समान मांसपेशियां मूत्र और मल निष्कासन को नियंत्रित करती हैं। जब कब्ज दीर्घकालिक होता है तो ये इन मांसपेशियों को बेकार कर सकता है, जिससे रात में बिस्तर गीला करने की समस्या उत्पन्न होती है। (और पढ़ें - कब्ज में परहेज)

 

मूत्र पथ या तंत्रिका तंत्र में संरचनात्मक समस्या:

ऐसा दुर्लभ मामलों में ही देखा जाता है कि बिस्तर गीला करना बच्चे की न्यूरोलॉजिकल प्रणाली या मूत्र प्रणाली के दोष से संबंधित होता है। (और पढ़ें - ब्लैडर इन्फेक्शन का इलाज)

बिस्तर गीला करने से बचाव - Prevention of Bedwetting in Hindi

बिस्तर गीला करने से बचाव - Prevention of Bedwetting in Hindi

बिस्तर गीला करने से बचाव कैसे होता हैं?


यहां कुछ परिवर्तनों के बारे में बताया गया है, जो आप घर पर कर सकते हैं। ये आपकी मदद कर सकते हैं –


शाम को बच्चे के तरल पदार्थों के सेवन को सीमित करें:

पर्याप्त तरल पदार्थ ग्रहण करना महत्वपूर्ण है, इसलिए आपका बच्चा एक दिन में कितना तरल पीता है, यह सीमित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। हालांकि अपने बच्चे को सुबह और दोपहर में ज़्यादा तरल पदार्थ पिलाने  पर ध्यान दें, जिससे उसे शाम को ज़्यादा प्यास न लगे। लेकिन यदि आपका बच्चा शाम को खेल का अभ्यास करता है या खेलों में भाग लेता है, तो उसके शाम के तरल पदार्थों को सीमित न करें।

 

कैफीनयुक्त पेय पदार्थों और खाद्य पदार्थों से बचें:

कैफीनयुक्त पेय पदार्थों को दिन के किसी भी समय बच्चों को देने से बचें, क्योंकि कैफीन मूत्राशय को उत्तेजित कर सकता है। एेसे में शाम को तो इसे देने से बिल्कुल परहेज किया जाना चाहिए। (और पढ़ें - कॉफी पीने के फायदे)

 

सोने से पहले दोहरे मूत्र त्याग (डबल वॉइडिंग) को प्रोत्साहित करें:

नियमित रूप से बिस्तर पर जाने से पहले मूत्र त्यागना और सोने से पहले एक बार फिर पेशाब करना डबल वॉइडिंग कहलाता है। अपने बच्चे को याद दिलाएं कि यदि आवश्यक हो, तो रात में शौचालय का उपयोग करना ठीक है। रात को कमरे में हलकी रोशनी रखें, ताकि आपका बच्चा आसानी से बेडरूम और बाथरूम का रास्ता ढूँढ सके। (और पढ़ें - गर्भावस्था में यूरिन इन्फेक्शन का इलाज)

 

दिनभर नियमित रूप से शौचालय के उपयोग को प्रोत्साहित करें:

दिन और शाम के दौरान अपने बच्चे को हर दो घंटे में या उससे अधिक समय में पेशाब करने की सलाह दें, जिससे बच्चा अक्सर तत्काल मूत्र त्यागने की आवश्यकता से बच सके। (और पढ़ें - प्रोस्टेट बढ़ने का इलाज)

 

कब्ज का इलाज:

यदि आपके बच्चे को कब्ज की समस्या है, तो आपके डॉक्टर एक स्टूल सॉफ्टनर (मल को मुलायम बनाने वाली दवा) की सलाह दे सकते हैं। (और पढ़ें - गर्भावस्था में कब्ज का इलाज)

 

चकत्तों को रोकें:

गीले जांघिया के कारण होने वाले चकत्तों को रोकने के लिए हर सुबह अपने बच्चे के नितम्बों और जननांगों को धोकर साफ करने में उनकी मदद करें। सोते समय प्रभावित हिस्सों में नमी से सुरक्षा करने वाली मरहम या क्रीम लगाने से भी इन्हें ठीक करने में मदद मिल सकती है। (और पढ़ें - त्वचा पर चकत्ते का इलाज)

बिस्तर गीला करने का निदान - Diagnosis of Bedwetting in Hindi

बिस्तर गीला करने का निदान - Diagnosis of Bedwetting in Hindi

बिस्तर गीला करने का निदान कैसे होता है?


आपके बच्चे को शारीरिक परीक्षण की आवश्यकता होगी। परिस्थितियों के आधार पर आपके डॉक्टर निम्न सुझाव दे सकते हैं -


संक्रमण या मधुमेह के लक्षणों की जांच के लिए मूत्र परीक्षण। (और पढ़ें - डायबिटीज में क्या खाना चाहिए)

गुर्दों या मूत्राशय के एक्सरे या अन्य इमेजिंग परीक्षण किए जा सकते हैं, यदि डॉक्टर को आपके बच्चे के मूत्र पथ की संरचना से संबंधित किसी समस्या या अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के होने की संभावना है। (और पढ़ें - लैब टेस्ट क्या है)

अन्य प्रकार के परीक्षण या मूल्यांकन, यदि अन्य स्वास्थ्य संबंधी मामलों पर संदेह है।

(और पढ़ें - सीटी स्कैन क्या है)


बिस्तर गीला करने का इलाज - Bedwetting Treatment in Hindi

बिस्तर गीला करने का इलाज - Bedwetting Treatment in Hindi

बिस्तर गीला करना का उपचार कैसे होता है?


अधिकांश बच्चे बिस्तर गीला करना अपने आप छोड़ देते हैं। यदि बिस्तर गीला करने का एक पारिवारिक इतिहास है, तो संभवतः बच्चा उसी उम्र के आसपास बिस्तर गीला करना बंद करेगा, जिस उम्र में माता-पिता ने बंद किया था।

अगर आपका बच्चा कभी-कभी रात को बिस्तर गीला करने के बाद विशेष रूप से परेशान या शर्मिंदा नहीं होता है, तो पारंपरिक घरेलू उपचार अच्छी तरह से काम कर सकते हैं। हालांकि, यदि आपका छोटा बच्चा सोने के दौरान बिस्तर को गीला करने के बारे में डरता है, तो वह अतिरिक्त उपचार का इस्तेमाल करने के लिए अधिक प्रेरित हो सकता है। बच्चे और माता-पिता की प्रेरणा उपचार के चयन और इसकी सफलता पर प्रभाव डाल सकती है।


अगर बेड वेटिंग के अन्तर्निहित कारण, जैसे – कब्ज या स्लीप एप्निया पाए जाते हैं, तो अन्य उपचार करने से पहले इन्हें ठीक किया जाना चाहिए। (और पढ़ें - नवजात शिशु में कब्ज की समस्या)


मॉइस्चर अलार्म:

 जैसे ही आपके बच्चे को पेशाब आना शुरू होता है, वैसे ही मॉइस्चर अलार्म बजने लगता है। यह आपके बच्चे को जगाने, मूत्र प्रवाह को रोककर शौचालय जाने में सहायता करता है। यदि आपका बच्चा गहरी नींद में सोता है, तो अलार्म की आवाज़ सुनने और बच्चे को जगाने के लिए किसी अन्य व्यक्ति की आवश्यकता हो सकती है। यदि आप मॉइस्चर अलार्म का इस्तेमाल करते हैं, तो इसे बहुत समय दें। इससे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देखने के लिए कम से कम दो सप्ताह लगते हैं और बिस्तर को गीला करने से रोकने के लिए 16 सप्ताह तक लगते हैं।


इलाज:


अंतिम उपाय के रूप में, आपके बच्चे के चिकित्सक बिस्तर गीला करने से रोकने के लिए दवा लिख सकते हैं। कुछ प्रकार की दवाएं निम्न कार्य कर सकती हैं –


रात के समय मूत्र उत्पादन में कमी: 

डेस्मोप्रेसिन दवा एक प्राकृतिक हार्मोन के स्तर को बढ़ाती है, जो शरीर को रात में मूत्र के कम उत्पादन के लिए बाध्य करता है। लेकिन दवा के साथ बहुत अधिक तरल पदार्थ पीने से रक्त में सोडियम के निम्न स्तर और दौरों की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। डेस्मोप्रेसिन का अल्पकालिक स्थितियों में भी उपयोग किया जा सकता है। (और पढ़ें - बच्चों की देखभाल)

 

मूत्राशय को शांत करें:

यदि आपके बच्चे का मूत्राशय छोटा है, तो एक एंटी-कोलीनर्जिक दवा मूत्राशय के संकुचन को कम करने और उसकी क्षमता में वृद्धि करने में मदद कर सकती है। इस दवा का आमतौर पर अन्य दवाओं के साथ संयोजन में प्रयोग किया जाता है। आमतौर पर इस दवा का सुझाव तब दिया जाता है, जब अन्य उपचार विफल हो जाते हैं। (और पढ़ें - बिस्तर गीला करने से रोकने के उपाय)

कभी-कभी दवाओं का संयोजन सबसे प्रभावी होता है, हालांकि इसकी कोई गारंटी नहीं है और दवाएं इस समस्या का इलाज नहीं करती हैं। आमतौर पर दवाओं के बंद कर दिए जाने पर बेड वेटिंग की समस्या दोबारा शुरू हो जाती है। 


(और पढ़ें - दवा की जानकारी)


बिस्तर गीला करने की जटिलताएं - Bedwetting Risks & Complications in Hindi

बिस्तर गीला करने की जटिलताएं - Bedwetting Risks & Complications in Hindi

बिस्तर गीला करने का खतरा कब बढ़ जाता है? 


कई कारकों को बिस्तर गीला करने के जोखिम के साथ जोड़ा गया है, जिनमें निम्न शामिल हैं –


स्लीप एप्निया

क्रोनिक (दीर्घकालिक) कब्ज

यौन शोषण (और पढ़ें - यौन उत्पीड़न क्या है)

सोने से पहले अत्यधिक द्रव पदार्थों का सेवन

मूत्र पथ में संक्रमण

कुछ दवाएं (उदाहरण के लिए कैफीन)

बिस्तर गीला करना किसी को भी प्रभावित कर सकता है, लेकिन लड़कियों की तुलना में यह समस्या लड़कों में सामान्य रूप से दोगुनी होती है। 

अगर बच्चे के माता-पिता में से एक या दोनों अपने बचपन में बिस्तर गीला करते थे, तो उनके बच्चे में भी यह लक्षण विशेष रूप से देखा जा सकता है।

एडीएचडी से ग्रसित बच्चों में बिस्तर गीला करना अधिक सामान्य है।

चिकित्सकीय स्थितियां, जैसे - गुर्दों, मूत्राशय या तंत्रिका तंत्र की असामान्य संरचना या कार्य।

(और पढ़ें - गुर्दे के संक्रमण का उपचार)


बिस्तर गीला करने से जुड़ी जटिलताएं क्या है?


हालांकि बिना किसी शारीरिक कारण के बिस्तर गीला करना निराशा का कारण बनता है, लेकिन  इससे कोई भी स्वास्थ्य जोखिम नहीं होता है। फिर भी बिस्तर गीला करना आपके बच्चे के लिए कुछ समस्याएं पैदा कर सकता है, जिसमें निम्न शामिल हैं –


अपराध बोध और शर्मिंदगी, जिससे आत्म सम्मान में कमी हो सकती है। 

सामाजिक गतिविधियों के लिए अवसरों में कमी, जैसे – किसी मित्र या रिश्तेदार के घर पर सोना और शिविर (camp) में जाना।

बच्चे के नितम्ब और जननांगों पर चकत्ते, खासकर यदि आपका बच्चा गीले अंडरवियर में सोता है।

(और पढ़ें - जननांग दाद का उपचार)


बिस्तर गीला करने में परहेज़ - What to avoid during Bedwetting in Hindi?

बिस्तर गीला करने में परहेज़ - What to avoid during Bedwetting in Hindi?

बिस्तर गीला करने में क्या परहेज करें?


मांस, मिठाई, कृत्रिम योजक (artificial additives) युक्त खाद्य पदार्थ, संसाधित (processed) भोजन, जंक फूड, सोया और अंडे को प्रतिबंधित करें।

कोला, सोडा और फलों के रस से बचें, क्योंकि ये समस्या को और गंभीर कर सकते हैं। (और पढ़ें - बेकिंग सोडा के फायदे)

बिस्तर गीला करने के लिए बच्चे को न डांटें।

बिस्तर पर जाने से पहले उसे पानी पीने से रोकें। 

अधिक प्यास से बचें। (और पढ़ें - पानी कब और कितना पीना चाहिए) 

बिस्तर गीला करने में क्या खाना चाहिए? - What to eat during Bedwetting in Hindi?

बिस्तर गीला करने में क्या खाना चाहिए? - What to eat during Bedwetting in Hindi?

बेड वेटिंग के लिए क्या आहार लेना चाहिए?


बेड वेटिंग और आहार के बीच एक सहसंबंध है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का भी यह मानना है कि कुछ खाद्य पदार्थ हैं, जो मूत्राशय को मजबूत बनाने में मदद कर सकते हैं, इसलिए मूत्राशय को सुदृढ़ बनाने वाले भोजन को अधिक मात्रा में खाने से बिस्तर गीला करने की समस्या को कम करने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा, उच्च फाइबर युक्त आहार के माध्यम से पाचन समस्याओं, जैसे - कब्ज का इलाज करके आप अधिकांश बच्चों की रात में बिस्तर में पेशाब करने की समस्या को समाप्त कर सकते हैं। नीचे कुछ आहार सम्बन्धी सुझाव दिए गए हैं, जिन्हें आप अपने बच्चे के आहार में शामिल कर सकते हैं -


(और पढ़ें - फाइबर युक्त आहार)


फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों का अधिक मात्रा में सेवन, जैसे –


ताज़े फल,

सब्जियां

साबुत अनाज

अनाज, क्योंकि ये शरीर से हानिकारक विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालते हैं। 

इसके अलावा बच्चे के आहार में उच्च मात्रा में दूध, तिल, केले और बादाम शामिल करें, क्योंकि ये बिस्तर गीला करने से रोकने में मदद करते हैं। (और पढ़ें - संतुलित आहार चार्ट)


ताज़े फल और सब्जियों से युक्त एक स्वस्थ आहार खाना सामान्य रूप से सभी बच्चों के लिए अच्छा होता है, क्योंकि इससे उनकी प्रतिरोधक क्षमता, संपूर्ण स्वास्थ्य और सेहत में सुधार होता है। ऐसे खाद्य पदार्थ शरीर के विभिन्न अंगों और प्रणालियों के विकास के लिए पर्याप्त पोषण प्रदान करते हैं। अतः विटामिन, खनिज और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर आहार खाएं, जिससे बच्चे के समग्र स्वास्थ्य को फायदा हो।


हालांकि, यह समझना महत्वपूर्ण है कि बिस्तर गीला करने में आहार की भूमिका को अभी भी निर्धारित किया जा रहा है। सीमित शोध के कारण किसी भी तरह का दावा करना संभव नहीं है।


(और पढ़ें - पौष्टिक आहार के गुण)